भुवनेश्वर , अप्रैल 25 -- क्या लुप्तप्राय ओलिव रिडले कछुओं ने इस साल गहिरमाथा तट पर सामूहिक घोंसला बनाने की अपनी वार्षिक परंपरा त्याग दी है? क्या ओलिव रिडले कछुओं की इस अनुपस्थिति के पीछे तीखे और ढलान वाले समुद्र तट का कोई हाथ है? क्या ट्रॉलर से मछली पकड़ने और मानवीय हस्तक्षेप ने उनकी एकांत स्थिति को प्रभावित किया है? या फिर यह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर है?ये प्रासंगिक बिंदु तब चर्चा के केंद्र में आये हैं, जब 'अरिबाडा' के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। 'अरिबाडा' एक स्पेनिश शब्द है, जो ओडिशा के केंद्रपाड़ा में गहिरमाथा के 'नेस्टिंग ग्राउंड' पर अंडे देने के लिए लाखों समुद्री प्रजातियों के एक साथ इकट्ठा होने की अनोखी प्राकृतिक विरासत का वर्णन करता है।
हर साल ये कछुए लाखों की संख्या में जनवरी-मार्च के दौरान गहिरमाथा तट पर इन प्रजातियों के दुनिया के सबसे बड़े ज्ञात प्रजनन स्थल (रूकरी) पर अंडे देने के लिए आते थे। राजनगर के मैंग्रोव वन प्रभाग (वन्यजीव) के मंडल वन अधिकारी (डीएफओ) वरदराज गांवकर ने कहा कि अतीत में ऐसे उदाहरण मिले हैं, जब कछुए मार्च के अंत में दिखाई दिये थे, लेकिन इसमें कभी इससे अधिक देरी नहीं हुई।
कछुए सामूहिक घोंसला बनाने के लिए ऋषिकुल्या नदी के मुहाने पर पहले ही आ चुके हैं, जो कि एक अन्य प्रजनन स्थल है। लेकिन वे अभी तक गहिरमाथा के 'नेस्टिंग ग्राउंड' पर नहीं दिखे हैं।
उन्होंने कहा कि हालांकि इस साल कछुओं के सामूहिक घोंसला बनाने की प्रक्रिया छोड़ने की संभावना है जैसा उन्होंने 2014 में किया था। फिर भी हम सामूहिक नेस्टिंग के लिए कछुओं के आगमन की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं कर रहे हैं, क्योंकि अगरनासी में मौसम की स्थिति और समुद्र तट की बनावट समुद्री जीवों के अंडे देने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने के लिहाज से एकदम आदर्श और सटीक है।
उन्होंने आगे कहा कि यह एक अनूठी प्राकृतिक घटना है। अभी तक यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि किस वजह से वे अब तक घोंसला बनाने के लिए समुद्र तट पर नहीं आये हैं।
हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बेरोकटोक ट्रॉलर फिशिंग और मानवीय हस्तक्षेप ने उनकी एकांत स्थिति को प्रभावित किया होगा, जिससे वे यहां आने से कतरा रहे हैं। वे अभी तक किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाये हैं कि कछुओं की इस अनुपस्थिति का मुख्य कारण क्या है।
इन समुद्री प्रजातियों के व्यवहार और निवास के तौर-तरीकों के इर्द-गिर्द हमेशा रहस्य बना रहता है। शोध अभी तक ज्यादा कुछ नहीं जान पाये हैं। वे प्रजनन और घोंसला बनाने के लिए ओडिशा तट को ही पसंद करते हैं, लेकिन सामूहिक नेस्टिंग के लिए गहिरमाथा तट को चुनने के पीछे उनकी प्राथमिकता के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।
विशेषज्ञों ने आगे कहा कि गहिरमाथा में कछुओं का न आना कई कारकों की वजह से हो सकता है, लेकिन ये सभी निष्कर्ष फिलहाल केवल अटकलों के दायरे में हैं।
गहिरमाथा में कछुए पिछली बार 2014 में 'अरिबाडा' के लिए नहीं आये थे, और इससे पहले वे 2008, 2002, 1998, 1997, 1988 और 1982 में भी अनुपस्थित रहे थे।
वर्ष 2025 में पांच मार्च से शुरू होने वाले पांच दिनों के अंतराल में लगभग 6.06 लाख कछुए समुद्र से बाहर निकले और अंडे देने के लिए समुद्र तट पर गड्ढे खोदे। इस घटना को 'अरिबाडा' (एक स्पेनिश शब्द) के रूप में जाना जाता है।
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