नयी दिल्ली , अप्रैल 02 -- तपेदिक (टीबी) जैसी घातक बीमारी से निपटने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज की है, जो भविष्य में इलाज के नए रास्ते खोल सकती है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत बोस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया में जीन एक्सप्रेशन के पारंपरिक मॉडल में एक बड़ी खामी का पता लगाया है। जीन एक्सप्रेशन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीन में मौजूद डीएनए की जानकारी का उपयोग करके क्रियाशील प्रोटीन या आरएनए अणुओं का निर्माण किया जाता है। यह अध्ययन खास तौर पर तपेदिक पैदा करने वाले बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस पर केंद्रित है, जो शरीर के भीतर कठिन परिस्थितियों में भी खुद को जीवित रखता है।
अब तक वैज्ञानिक मानते थे कि σ (सिग्मा) फैक्टर नामक प्रोटीन ट्रांसक्रिप्शन की शुरुआत के बाद आरएनए पॉलिमरेज़ से अलग हो जाता है, जिसे "यूनिवर्सल σ-साइकिल" कहा जाता था। लेकिन इस नए शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है।
शोधकर्ताओं डॉ. जयंत मुखोपाध्याय और डॉ. एन. हाजरा ने पाया कि सभी सिग्मा फैक्टर एक जैसा व्यवहार नहीं करते। कुछ सिग्मा फैक्टर ट्रांसक्रिप्शन के दौरान अलग हो जाते हैं, जबकि कुछ पूरी प्रक्रिया में जुड़े रहते हैं।
अध्ययन में σए और σई जैसे सिग्मा फैक्टर ट्रांसक्रिप्शन के दौरान अलग हो जाते हैं, जबकि σएफ पूरे समय आरएनए पॉलिमरेज़ से जुड़ा रहता है। यह दर्शाता है कि बैक्टीरिया जीन नियंत्रण के लिए एक ही नहीं, बल्कि कई अलग-अलग रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूक्लिक एसिड्स रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज एंटीबायोटिक दवाओं के विकास के लिए नए और अधिक सटीक लक्ष्य प्रदान कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य की दवाएं बैक्टीरिया के जरूरी प्रोटीन-प्रोटीन इंटरैक्शन को बाधित करके काम कर सकती हैं, जिससे दवा-प्रतिरोध (एंटीबॉयटिक रेसिस्टेंस) की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
बढ़ते एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बीच, यह खोज न केवल बुनियादी विज्ञान को आगे बढ़ाती है, बल्कि अगली पीढ़ी की एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी के विकास में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
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