नयी दिल्ली , मार्च 13 -- टसर रेशम की वह अलौकिक बुनावट, जिसमें कारीगरों की उंगलियाँ सौंदर्य का संगीत बुनती थीं, आज विस्मृति के अंधियारे गर्भ में विलीन हो रही है। वह बेजोड़ बारीकी और वह अद्वितीय कौशल, जो कभी भारत की पहचान था, अब केवल इतिहास की धूल भरी परतों में ही शेष रह गया है।
वे शिल्पी, जिन्होंने अपने खून पसीने से टसर के एक-एक सूत में प्राण फूंके थे, वे थक चुके हैं। उनकी अनमोल कृतियों की केवल सुगंधित स्मृतियाँ ही अवशेष के रूप में भावी पीढ़ियों के मानस पटल पर अंकित हैं। काल के निष्ठुर प्रवाह में कला के वे स्वर्णिम अध्याय धुंधले पड़ते जा रहे हैं, जिनकी बारीकियां कभी पर्वत-पठार की भौगोलिक सीमाओं को लांघकर दिगंतर में अपनी कीर्ति पताका फहराती थी।
नियति का क्रूर उपहास देखिए कि जिन सधे हुए हाथों ने कभी राजसी वस्त्रों का सृजन किया था, आज वे ही हाथ दो वक्त की रोटी के लिए मजदूरी करने या फुटपाथ पर रेहड़ी लगाने को अभिशप्त हैं। उत्तर दिनाजपुर के करांदिघी स्थित डोमोहना की गलियाँ, जो कभी करघों की लयबद्ध 'खट-खट' से गूंजती रहती थीं, आज मौन की चादर लपेटे खड़ी हैं। उन महान बुनकरों के वंशजों की आँखों में आज भी शुद्ध टसर की वह सुनहरी चमक एक टीस बनकर कौंधती है।
आज की 'फटाफट परिणाम' चाहने वाली पीढ़ी इस श्रमसाध्य साधना से मुंह फेर चुकी चुकी है। धैर्य और एकाग्रता की कमी ने सृजन के उस आनंद को लील लिया है, जो घंटों की कड़ी मेहनत के बाद मिलता था। स्थानीय बुनकर संघ के प्रवक्ता मजीबुर रहमान का स्वर आक्रोश और पीड़ा से भरा है। वे कहते हैं कि सरकारी सहायता की किरणें इन अंधेरे करघों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं, और कच्चे माल की कमी इस मर रही कला के गले की फांस बन गया है।
मगर टसर रेशम के कारीगरों की दर्द भरी कहानी में एक ग्रहण और लगा हुआ है। वह है चीनी रेशम। जी हां, यह चीनी रेशम मशीनों से बनता है और उनकी नकली चमक-दमक के सामने टसर की वह वो गरिमा हार रही है, जो उसकी पहचान भी थी और अस्मिता भी। यह बात पत्थर पर पड़ी लकीर की मानिंद है कि टसर की कोमलता और उसकी रूहानी बनावट चीनी रेशम से कहीं श्रेष्ठ है, कहीं आगे है लेकिन आज के उपभोक्ता को उसकी कद्र नहीं। वे अनायास ही, अनजाने में ही अल्पकालिक चमक और कम कीमत के मायाजाल में फंसकर स्वदेशी विरासत की बलि दे रहे हैं।
डोमोहना के साजिद अली, जिनकी कला का कभी लोहा माना जाता था, आज बाजार की इस गलाकाट स्पर्धा में परास्त होकर सड़क किनारे ब्रेड बेचने को विवश हैं। साजिद अतीत की खिड़की खोलते हुए बताते हैं कि आधी सदी पहले यहाँ के टसर की खुशबू अरब के रेगिस्तानों और अफगानिस्तान की पहाड़ियों तक फैली थी। वे 'काबुलीवाले', जो यहाँ से व्यापार कर लौटते थे, अफगान रईसों के लिए डोमोहना का टसर एक अनमोल सौगात की तरह ले जाते थे। उस स्वर्ण युग में व्यापारियों का विश्वास ही पूंजी थी, जो अग्रिम राशि के रूप में बुनकरों के चूल्हे जलाए रखती थी।
सत्ता के गलियारों में 'टसर क्लस्टर' जैसी योजनाएँ बनीं, चुनावी नारों में इस कला के पुनरुद्धार का हलफ भी उठाया गया लेकिन सब वही ढाक के तीन पात। स्थानीय विधायक गौतम पॉल के दावे फाइलों तक सीमित जान पड़ते हैं। कारीगरों को अब खोखले वादों की बैसाखी नहीं, बल्कि वह निवेश और सुरक्षित बाजार चाहिए जहाँ मशीनी 'सिंथेटिक' जालसाजी का दखल न हो, जहां मशीन की नकली चमक, असली पर हावी न हो।
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