नयी दिल्ली , अप्रैल 13 -- उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले पर सुनवाई करते हुए सोमवार को कहा कि यदि जीत का अंतर दो प्रतिशत हो और 15 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर होने के कारण मतदान न कर पायें, तो यह गंभीर चिंता का विषय होगा।
शीर्ष अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल में मतदाता 'दो संवैधानिक संस्थाओं' राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच 'फंसे' नजर आते हैं, जो भरोसे की कमी को दर्शाता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की एक पीठ पश्चिम बंगाल में एसआईआर और अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन न्यायाधिकरणों को 34 लाख से अधिक अपीलों पर निर्णय लेने का दायित्व सौंपा गया है, जबकि मतदान का पहला चरण अगले सप्ताह निर्धारित है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति बागची की पीठ ने कहा कि मतदाताओं का नाम सूची में शामिल होना उनका मौलिक अधिकार है, जबकि चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता बनाये रखना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। न्यायमूर्ति बागची ने चुनावी नतीजों पर पड़ने वाले संभावित असर को उजागर करते हुए कहा, "अगर 10 प्रतिशत मतदाता मतदान नहीं करते हैं और जीत का अंतर 10 प्रतिशत से ज़्यादा है... तो क्या होगा? मान लीजिए कि जीत का अंतर दो प्रतिशत है और 15 प्रतिशत मतदाता वोट नहीं डाल पाये। हम कोई राय ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं लेकिन हमें निश्चित रूप से इस पर विचार करना होगा।"शीर्ष अदालत ने बिहार जैसे दूसरे राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया में विचलन को भी संज्ञान में लिया।
पीठ ने एसआईआर प्रक्रिया में 'तार्किक विसंगतियों' जैसी श्रेणी को लेकर सवाल उठाये, जो अन्य राज्यों में लागू नहीं है। साथ ही कहा कि किसी मतदाता के नाम पर सवाल उठाने के दौरान उचित कारण दर्ज करना आवश्यक है और पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष एवं पारदर्शी होनी चाहिए।
पीठ ने बिहार एसआईआर की कार्यवाही में चुनाव आयोग के रुख का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग पहलेसे ही 2002 की मतदाता सूची में शामिल थे, उन्हें दस्तावेज़ जमा करने की ज़रूरत नहीं थी। न्यायमूर्ति बागचीने चुनाव आयोग से कहा, "आप अपने साफ़-साफ़ बयान से भटक रहे हैं। बिहार एसआईआर में अपने लिखित जवाबों को फिर से देखिए।"सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, न्यायालय ने कहा कि एक 'मज़बूत अपीलीय तंत्र' ज़रूरी है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "हमें एक मज़बूत व्यवस्था चाहिए। न्यायालय की कोशिश यह है कि किसी व्यक्तिको मतदाता सूची में शामिल होने में मदद मिले।"उन्होंने कहा कि यह स्थिति एक गहरी संस्थागत समस्या को दर्शाती है। उन्होंने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच चल रहे टकराव की ओर इशारा करते हुए कहा, "यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें मतदाता दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच पिस रहे हैं।"शीर्ष अदालत ने इस चरण पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे अपनी शिकायतों के निवारण के लिए अपीलीय न्यायाधिकरणों का रुख करें।
साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने एक अप्रैल को मालदा में एसआईआर कार्य में लगे न्यायिक अधिकारियों के घेराव मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को आरोपियों की राजनीतिक पृष्ठभूमि की जांच करने का निर्देश दिया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित