नयी दिल्ली , फरवरी 04 -- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने देश में नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास को नई गति देने की दिशा में एक अहम पहल करते हुए मंगलवार को अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) के अंतर्गत अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) फंड की पहली ओपन कॉल लॉन्च की।
यह कॉल टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (टीडीबी) के माध्यम से जारी की गई है, जिसका उद्देश्य स्वदेशी तकनीकों के व्यवसायीकरण को व्यवस्थित और दीर्घकालिक वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
इस अवसर पर श्री सिंह ने कहा कि यह पहल पारंपरिक सरकारी फंडिंग मॉडल से एक बड़े और साहसिक बदलाव का प्रयास है। उन्होंने कहा कि अब तक सरकारें निजी क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए मुख्यतः सीएसआर आधारित निवेश पर निर्भर रही हैं, लेकिन निजी क्षेत्र की तकनीकों को सीधे सरकारी समर्थन के साथ वित्तीय सहायता देने की व्यवस्था सीमित रही है। आरडीआई फंड इस अंतर को पाटने का काम करेगा, जिससे निजी उद्यम उच्च जोखिम वाली तकनीकों को व्यावसायिक स्तर तक ले जा सकेंगे।
श्री सिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोलना एक ऐतिहासिक निर्णय रहा है। आरडीआई फंड को इसी परिवर्तन के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि निजी क्षेत्र को वित्तीय जोखिम से सुरक्षा मिल सके और साथ ही पारदर्शिता व जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। उन्होंने बताया कि इस फंड में दीर्घकालिक, किफायती वित्तपोषण के साथ-साथ हिस्सेदारी से जुड़ा विकल्प भी शामिल हैं, जिससे सरकार और उद्यम दोनों जोखिम साझा कर सकें।
श्री सिंह मंत्री ने बताया कि आरडीआई फंड का कुल कोष 1 लाख करोड़ रुपये का है। इसके अंतर्गत 2 से 4 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर 15 वर्ष तक की अवधि के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस संरचना को इस तरह तैयार किया गया है कि तकनीक विकसित करने वालों को पूंजी तक आसान पहुंच मिले और वित्तीय अनुशासन भी बना रहे।
श्री सिंह ने बताया कि इस संबंध में अब तक करीब 191 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें से अधिकांश निजी क्षेत्र से हैं। उन्होंने बताया कि निजी उद्योग अब सरकार की नवाचार समर्थक नीतियों पर भरोसा कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आवेदन योजना की मूल भावना के अनुरूप हों और फंड का उपयोग वास्तविक तकनीकी विकास और उच्चीकरण के लिए ही किया जाए।
कार्यक्रम में बताया गया कि टीडीबी की पहली आरडीआई कॉल उन परियोजनाओं के लिए है जो प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल) (टीआरएल) 4 या उससे ऊपर की अवस्था में हैं। फंडिंग सेकेंड लेवल फंड मैनेजर्स (एसएलएमएस) के माध्यम से ऋण, इक्विटी या हाइब्रिड इंस्ट्रूमेंट्स के रूप में दी जाएगी। किसी भी परियोजना के लिए कुल लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता उपलब्ध होगी, जबकि शेष राशि कंपनी या निजी निवेशकों को जुटानी होगी।
इस योजना की एक अहम विशेषता यह है कि इसमें कोई गिरवी रखने (कोलेटरल), व्यक्तिगत या कॉरपोरेट गारंटी की आवश्यकता नहीं होगी। प्रस्तावों का मूल्यांकन वैज्ञानिक, तकनीकी, वित्तीय और व्यावसायिक योग्यता के आधार पर किया जाएगा। सरकार ने मूल्यांकन और मंजूरी की प्रक्रिया के लिए लगभग 8 सप्ताह की समय-सीमा तय की है, जिससे परियोजनाओं को समयबद्ध सहायता मिल सके। यह योजना अनुदान आधारित नहीं, बल्कि व्यावसायिक रूप से टिकाऊ तकनीकों को बाजार तक पहुंचाने पर केंद्रित है।
कार्यक्रम में मंच पर टीडीबी के सचिव राजेश पाठक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और नवाचार जगत से जुड़े हितधारक उपस्थित रहे।
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