जालंधर , फरवरी 28 -- भारतीय दुर्लभ रोग संगठन के कार्यकारी सदस्य डॉ नरेश पुरोहित ने कहा है कि पंजाब में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को दुर्लभ रोगों के लक्षणों और जांच के बारे में जानकारी देना जरूरी है, क्योंकि सर्वाधिक मरीजों में दुर्लभ रोग के विषय में जानकारी का बहुत अभाव है। उन्होंने कहा कि मरीजों को तब पता चलता है, जब वह किसी दूसरी बीमारी का इलाज करवाने के लिए अस्पताल पहुंचते हैं। भारत में दुर्लभ रोगों के संकटसे निपटने के लिए इस दिशा में जमीनी स्तर पर सकारात्मक प्रयासों की तत्काल आवश्यकता हैं।

फिरोजपुर स्थित मंडल रेलवे अस्पताल द्वारा शनिवार को दुर्लभ रोग दिवस के अवसर पर दुर्लभ बीमारियां: कारण एवं उपचार विषय पर आयोजित एक कार्यशाला को संबोधित करते हुए, जाने-माने सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ पुरोहित ने मुख्य भाषण में कहा कि यह दुर्लभ रोग बहुत कम लोगों में पाये जाते हैं। सत्तर से 80 फीसदी दुर्लभ रोग जीन में बदलाव के कारण होते हैं। कई मामलों में इन बीमारियों के लक्षण जन्म के समय या कम उम्र में दिखाई देते हैं। यह बीमारी संक्रामक नहीं है। यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे को नहीं जाते हैं। दुर्लभ बीमारियों में थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस, हीमोफिलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी शामिल हैं।

फरीदकोट स्थित बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. पुरोहित ने कार्यशाला में बताया कि विश्वभर में लगभग 35 करोड़ लोग दुर्लभ रोगों से प्रभावित हैं, जिनमें से लगभग 20 प्रतिशत भारत से हैं। वर्तमान में विश्व स्तर पर लगभग 7,000 दुर्लभ रोगों की पहचान की जा चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 63 रोगों के लिए ही स्वीकृत उपचार उपलब्ध हैं। अस्सी प्रतिशत दुर्लभ रोग आनुवंशिक (जेनेटिक) होते हैं तथा किसी रोग को दुर्लभ तब माना जाता है जब वह 2,000 व्यक्तियों में से एक को प्रभावित करता हो।

प्रसिद्ध शोधार्थी ने दुर्लभ रोगों पर वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों की पहचान, उपचार और रोकथाम के लिए चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम जन में जागरूकता अत्यंत आवश्यक है, लेकिन अंधविश्वास, अधिक खर्च और समय की भ्रांतियों के कारण कई परिवार इन रोगों का सही उपचार नहीं करवा पाते। समय रहते पहचान हो जाये, तो मरीज को उचित उपचार और परामर्श मिल सकता है, इससे जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनायी जा सकती है। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों के उपचार में सबसे बड़ी अड़चन उपचार संबंधी लागत है। दुर्लभ बीमारियों के टीके एवं दवाइयां खरीदने के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूटस ऑफ हेल्थ (एनआईएच) के एक शोध अध्ययन के अनुसार दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित रोगियों की स्वास्थ्य देखभाल लागत अन्य बीमारियों के मरीजों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक है। अशिक्षा एवं लोगों में जागरूकता का अभाव भी दुर्लभ रोगी के उपचार में बड़ी बाधा है। हमारे देश में समस्या और भी जटिल हैं। हमारी आबादी बहुत अधिक है, स्वास्थ्य सेवा संसाधन सीमित है जबकि दुनिया भर के दुर्लभ रोगों से ग्रसित रोगियों में से एक तिहाई रोगी (लगभग 7 करोड़) भारत में हैं। ऐसे में दुर्लभ रोगों से निपटना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि सरकार द्वारा दुर्लभ रोगी के उपचार संबंधी कई घोषणाएं की गयी हैं। कुछ दुर्लभ रोगों को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है। कुछ राज्यों ने दुर्लभ रोगी के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार शुरू किया है। सरकार द्वारा विश्व में पहले से ही परीक्षण की जा चुकी कुछ ऑरफेन ड्रग्स (दुर्लभ रोगों में प्रयुक्त होने वाली दवाइयां) के नैदानिक परीक्षण की भारत में प्रवेश की मंजूरी दी गयी है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिये कि दुर्लभ रोगों के रोकथाम के लिए सरकारी एवं गैर-सरकारी दोनों ही अस्पतालों में नवजात शिशुओं की जांच को अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि बीमारी का निदान प्रारंभिक चरण में ही हो सके। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में ज्यादातर दुर्लभ रोगों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि इनके उपचार एवं नैदानिक जांचों की पहुंच आम जन तक बढ़ सके। दवा कंपनियों को दुर्लभ रोगियों के लिए सस्ता उपचार विकसित करने के लिए प्रोत्साहन नीति बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अन्य रोगों की तरह ही दुर्लभ रोगों के उपचार एवं निदान की सहज सुलभता भी अति आवश्यक है क्योंकि इनसे ग्रसित आबादी भी कोई कम नहीं है। ऐसे में आज के अति विकसित, संवेदनशील और पूर्णतया सक्षम वैज्ञानिक युग में दुर्लभ रोगों से पीडि़त रोगियों को असमय काल का ग्रास बनने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है।

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