जेनेवा , दिसंबर 27 -- पृथ्वी के औसत तापमान में एक डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन से 10 करोड़ से अधिक लोगों के मानवाधिकारों पर असर पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र ने एक ताजा अध्ययन के हवाले से यह जानकारी दी है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सलाहकार निकाय 'अर्थ कमीशन' की सह-अध्यक्ष और प्रोफेसर जोयिता गुप्ता ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र समाचार को दिये एक साक्षात्कार में बताया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को न केवल जलवायु आपातकाल के रूप में, बल्कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में भी समझा जाना चाहिए।
प्रोफेसर गुप्ता ने कहा कि 1992 के जलवायु सम्मेलन में मानवीय क्षति को कभी भी आंकड़ों में नहीं मापा गया। उन्होंने कहा कि जब 2015 में पेरिस समझौते को अपनाया गया था, तब वैश्विक सहमति तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने पर बनी थी, जिसे बाद में 1.5 डिग्री सेल्सियस को सुरक्षित लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया। लेकिन तब भी यह छोटे द्वीपीय देशों के लिए यह अधिक था।
सुश्री गुप्ता ने कहा कि समुद्री जल का बढ़ता स्तर, खारे पानी का तटीय क्षेत्रों में प्रवेश और भीषण तूफान पूरे के पूरे द्वीपीय देशों को लिए भयावह खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। जब धनी देशों ने वैज्ञानिक प्रमाण मांगे, तो 'इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज' (आईपीसीसी) को 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस के बीच के अंतर का अध्ययन करने का काम सौंपा गया। परिणाम स्पष्ट थे कि 1.5 डिग्री सेल्सियस काफी कम विनाशकारी है लेकिन फिर भी खतरनाक है।
प्रोफेसर गुप्ता 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित अपने शोध में तर्क देती हैं कि एक डिग्री सेल्सियस ही 'न्यायसंगत सीमा' है, क्योंकि उस बिंदु के बाद जलवायु परिवर्तन के प्रभाव वैश्विक जनसंख्या के एक प्रतिशत से अधिक यानी लगभग 10 करोड़ लोगों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि दुनिया ने 2017 में ही एक डिग्री की सीमा पार कर ली थी और 2030 तक इसके 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार करने की संभावना है।
सुश्री गुप्ता ने स्पष्ट किया कि सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है और धनी देशों को अपने उत्सर्जन में भारी रूप से कटौती करनी होगी ताकि दूसरों के लिए 'कार्बन स्पेस' बनाया जा सके। ऐसा न करना असमानता को अन्याय में बदल देता है। उन्होंने विस्थापन के मुद्दे पर कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आज अधिकांश विस्थापन देशों के भीतर ही होता है।
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