श्रीनगर , दिसंबर 22 -- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने कश्मीर पर लिखी 25 पुस्तकों को जब्त करने के जम्मू-कश्मीर सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित कर दी है। न्यायालय का मानना था कि प्रतिवादियों को पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी आपत्तियां दर्ज नहीं की।
मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली, न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल और न्यायमूर्ति शहजाद अजीम की तीन न्यायाधीशों वाली विशेष पीठ ने दिसंबर के पहले सप्ताह में एक आदेश पारित करते हुए कहा था कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इस मामले में अपना जवाब प्रस्तुत नहीं किया है।
हालांकि अदालत ने कार्यवाही को स्थगित करने का कोई औचित्य नहीं होने की बात की लेकिन मामले को 11 फरवरी, 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया, क्योंकि सरकारी वकील ने अगली सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले आपत्तियां दर्ज करने का वचन दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि चूक की स्थिति में उचित आदेश जारी किए जाएंगे। याचिकाओं में गृह विभाग की पांच अगस्त की अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें सीआरपीसी की धारा 95 के अंतर्गत 25 प्रकाशनों को जब्त करने का आदेश दिया गया था और आरोप लगाया गया कि ये पुस्तकें "झूठी कहानियों एवं अलगाववाद" का प्रचार करती हैं।
पत्रकार डेविड देवदास, सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल कपिल काक और अन्य, अधिवक्ता शाकिर शब्बीर और स्वास्तिक सिंह द्वारा दायर चार अलग-अलग याचिकाओं में इस अधिसूचना को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिसूचना मनमाना, असंवैधानिक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।
जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने पांच अगस्त को कश्मीर से संबंधित 25 पुस्तकों को प्रतिबंधित कर दिया था, जिनमें अरुंधति रॉय और संवैधानिक विशेषज्ञ ए.जी. नूरानी जैसे प्रख्यात लेखकों की रचनाएं भी शामिल हैं और इन पुस्तकों पर अलगाववाद को भड़काने के आरोप लगाए गए हैं।
प्रतिबंधित सूची में नूरानी की पुस्तक 'द कश्मीर डिस्प्यूट 1947-2012', सुमंत्रा बोस की 'कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स एंड कॉन्टेस्टेड लैंड्स', डेविड देवदास की 'इन सर्च ऑफ अ फ्यूचर: द कश्मीर स्टोरी', रॉय की 'आज़ादी' और पत्रकार अनुराधा भसीन की 'अ डिसमेंटल्ड स्टेट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370' जैसी पुस्तकें शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार इस मामले में पक्षकार नहीं है क्योंकि उसने प्रतिबंध आदेश जारी नहीं किया था।
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