नयी दिल्ली , जनवरी 24 -- अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक दुनिया के कई बड़े नेता भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बन चुके हैं। लेकिन कर्तव्य पथ पर किसी विदेशी मेहमान को वैसा गर्मजोशी भरा स्वागत शायद ही मिला हो जैसा दक्षिण अफ्रीका के स्वतंत्रता सेनानी नेल्सन मंडेला और महान मुक्केबाज मोहम्मद अली को मिला था।

दक्षिण अफ्रीका के गांधीवादी नेता नेल्सन मंडेला 1995 की गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि थे। जब तक मंडेला वहां मौजूद रहे, दर्शक लगातार उनका नाम दोहराते रहे। उस दृश्य के गवाह रहे लोग कहते हैं कि राजपथ पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का ऐसा उत्साहपूर्ण स्वागत पहले कभी नहीं देखा गया था। मंडेला की तरह ही कर्तव्य पथ पर मौजूद विशाल जनसमूह ने मुक्केबाज मोहम्मद अली का भी तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया था। वह 1976 की परेड में विशेष अतिथि थे, जब वे अपने करियर के शिखर पर और एक वैश्विक आइकन थे। तब कर्तव्य पथ को ही राजपथ कहा जाता था। साल 2022 में केंद्र सरकार ने राजपथ का नया नाम कर्तव्य पथ कर दिया था। इससे पहले यह मार्ग किंग्सवे नाम से जाना जाता था।

बॉक्सर मोहम्मद अली परेड शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही अपनी सीट पर बैठे थे। जैसे ही लाउडस्पीकर पर उनके आगमन की घोषणा हुई, हजारों लोगों ने शोर मचाकर उनका अभिवादन किया। उस वर्ष मशहूर कमेंटेटर जसदेव सिंह आंखों देखा हाल सुना रहे थे। उन्होंने बताया था कि कैसे मोहम्मद अली हवा में मुक्का लहराकर अपने प्रशंसकों का जवाब दे रहे थे। जब भी वे ऐसा करते, भीड़ उत्साह से भर जाती। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी मोहम्मद अली को देखते हुए बार-बार मुस्कुराती नजर आई थीं।

उस समय की परेड की तुलना में आज सुरक्षा कारणों से परेड के स्वरूप में भी बदलाव आए हैं। संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए आतंकी हमले के बाद 2002 में पहली बार परेड का मार्ग छोटा किया गया। तब से परेड इंडिया गेट, आईटीओ और दरियागंज होते हुए लाल किले पर समाप्त होती है। इससे परेड का कनॉट प्लेस से गुजरना बंद हो गया, जिससे दिल्लीवासी शहर के दिल कहे जाने वाले इस हिस्से से परेड देखने के आनंद से वंचित हो गए।

पुराने मार्ग के अनुसार, परेड कर्तव्य पथ से इंडिया गेट तक जाती थी और फिर कस्तूरबा गांधी मार्ग की ओर मुड़ जाती थी। वहां से यह कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल का पूरा चक्कर लगाती थी और मिंटो रोड, थॉमसन रोड व अजमेरी गेट होते हुए लाल किले तक जाती थी। इस पूरे रास्ते पर हजारों लोग सुबह से ही अपनी जगह बना लेते थे। कनॉट प्लेस पहुंचने तक मार्च करने वाले सैनिक भी थोड़े सहज हो जाते थे और मुस्कुराकर भीड़ का अभिवादन स्वीकार करते थे। लोग न केवल सड़कों से बल्कि इमारतों की छतों से भी इस भव्य नजारे को देखते थे।

हर साल जनवरी आते ही दिल्ली में तैयारियां चरम पर होती हैं क्योंकि मुख्य आयोजन यहीं होता है। परेड के मुख्य आकर्षणों में वे बहादुर बच्चे (बाल वीर) भी शामिल होते हैं, जिन्हें उनके साहस और वीरता के लिए सम्मानित किया जाता है। जब वे राष्ट्रपति को सलामी देते हुए आगे बढ़ते हैं, तो जनता उनका जोरदार स्वागत करती है। ये बच्चे 1959 से परेड का हिस्सा हैं। पहले वे लंबे समय तक हाथियों पर सवार होकर आते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वे खुली जीप में सवार होते हैं।

गणतंत्र दिवस से दस दिन पहले ये बच्चे राजधानी पहुंच जाते हैं और अभ्यास के साथ-साथ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेना प्रमुखों जैसी बड़ी हस्तियों से मिलते हैं। वे दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारकों और मनोरंजन स्थलों का भ्रमण भी करते हैं। हालांकि, परेड के बाद ये बहादुर बच्चे अक्सर सार्वजनिक चर्चा से ओझल हो जाते हैं। आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि राज्य सरकारें इन बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने के हर संभव अवसर प्रदान करें।

कर्तव्य पथ से परेड शुरू होने का अपना एक प्रतीकात्मक महत्व है क्योंकि यह औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता और गणतंत्र बनने की भारत की यात्रा का प्रतीक है। राष्ट्रपति भवन से शुरू होकर यह मार्ग विजय चौक और इंडिया गेट होते हुए आगे बढ़ता है। इंडिया गेट उन शहीदों की याद दिलाता है जिन्होंने देश के लिए जान दी।

नयी दिल्ली की प्रतिष्ठित इमारतों के डिजाइनरों की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन कर्तव्य पथ का निर्माण करवाने वाले सरदार नारायण सिंह का नाम कम ही लोग जानते हैं। जब नई दिल्ली के निर्माण के समय सड़क बनाने की जिम्मेदारी की बात आई, तो सरदार नारायण सिंह ने इसे संभाला और उस दौर के मानकों के हिसाब से बेहतरीन सड़कें दीं।

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