रांची , दिसंबर 31 -- झारखंड के भाकपा माले के राज्य सचिव मनोज भक्त ने कहा कि नया वर्ष 2026 नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने का अवसर देता है, लेकिन बीते वर्षों के अनुभव यह भी बताते हैं कि केवल सत्ता परिवर्तन से जनता के सवाल हल नहीं होते, इसके लिए सतत संघर्ष ज़रूरी है।

श्री भक्त ने आज यहां कहा कि बीते वर्ष झारखंड की जनता ने फासीवादी केंद्रीकरण और दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष में कुछ अहम सफलताएँ हासिल की हैं। जनदबाव के चलते आदिवासी स्वशासन से जुड़े पेसा एक्ट को लागू करने की दिशा में पहल हुई, जिसने ग्राम सभा और सामुदायिक अधिकारों को फिर से विमर्श के केंद्र में लाया। यह जनता की एकजुटता की आंशिक जीत है।लेकिन राज्य और केंद्र-दोनों सरकारें जनता की बुनियादी अपेक्षाओं पर खरा उतरने में असफल रही हैं। भूमि अधिग्रहण के नाम पर आदिवासी और किसान समुदायों को उजाड़ा जा रहा है। फर्जी मुठभेड़ों और दमन की घटनाएँ लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। बड़े कॉरपोरेट हितों, विशेषकर अडानी समूह से जुड़े मामलों में हेमंत सरकार का रवैया झारखंड की जनता की उम्मीदों के विपरीत रहा है।

उन्होंने कहा कि रोज़गार के मोर्चे पर हालात निराशाजनक हैं। युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर घटे हैं, मनरेगा को लगातार कमजोर किया गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएँ भी सरकारी उपेक्षा और निजीकरण के दबाव में बदहाल होती जा रही हैं। आने वाले वर्ष में ज़रूरी है कि मजदूर-विरोधी लेबर कोड्स के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित हो और मनरेगा पर विशेष सत्र बुलाकर काम के दिनों, मजदूरी और बजट में बढ़ोतरी सुनिश्चित की जाए।

श्री भक्त ने कहा कि भाकपा माले का संकल्प है कि 2026 को जनसंघर्षों का वर्ष बनाया जाएगा। भूमि, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए। जनता की संगठित ताकत ही फासीवाद, कॉरपोरेट लूट और राज्य दमन के खिलाफ निर्णायक विकल्प है।

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