अमृतसर , दिसंबर 10 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता प्रोफेसर सरचंद सिंह ख्याला ने बुधवार को कहा कि श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज द्वारा 'वीर बाल दिवस' को लेकर राज्य के सांसदों को पत्र लिखकर शिरोमणि कमेटी और अकाली नेतृत्व की राजनीतिक अक्षमता का सबूत दिया है।
प्रो. ख्याला ने कहा कि अकाली दल और शिरोमणि कमेटी अपनी राजनीतिक नाकामी छिपाने के लिए 'वीर बाल दिवस' को विवादित मुद्दा न बनाएँ और पंथ को भ्रमित करने की कोशिश न करें। गुरमत् विचारधारा जहाँ सौहार्द सिखाती है, वहीं अत्याचार के विरुद्ध सब्र और दृढ़ता का संदेश भी देती है। इसलिए सहिबज़ादों की लाजवाब शहादत को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाना आज की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सहिबज़ादों के सम्मान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना कोई राजनीति नहीं, बल्कि शहादत को राष्ट्रीय नमन है। आज तक किसी भी सरकार ने ऐसा कदम नहीं उठाया, जो प्रधानमंत्री मोदी ने उठाया है। उन्होंने देश को सहिबज़ादों की शहादत से परिचित कराया है। इससे सिख पहचान और खालसा की शौर्य परंपरा और प्रखर होकर उभरेगी। उन्होंने कहा कि हमें गर्व होना चाहिए कि गुरु के लालों की शहादत का संदेश अब प्रधानमंत्री के इस पवित्र प्रयास वीर बाल दिवस के जरिए हिंदुस्तान के हर कोने तक पहुँच रहा है।
प्रो ख्याला ने याद दिलाया कि सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई में दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने 17 जनवरी 2018 को राष्ट्रीय राजधानी के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया था, जिसमें श्री बादल तथा केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मुख्य अतिथि थे। उस मंच पर सहिबज़ादों की शहादत को 'बाल दिवस' के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की खुलकर वकालत की गई थी। इस कार्यक्रम में दिल्ली कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के., महासचिव मनजिंदर सिंह सिरसा, अकाली सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा, पूर्व वीसी डॉ. जसपाल सिंह, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन तरलोचन सिंह सहित अनेक अकाली नेता उपस्थित थे।
जहाँ तक पंथक स्वीकृति का प्रश्न है, हर वर्ष 14 नवंबर को 'बाल दिवस' मनाया जाता है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 जनवरी 2022 को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर घोषणा की कि सहिबज़ादों की शहादत की याद में 26 दिसंबर को 'वीर बाल दिवस' के रूप में मनाया जाएगा, तो तख़्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में मौजूद अकाल तख़्त के जथेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने यह संदेश संगत के सामने रखा था और संगत ने जयकारों के साथ इस निर्णय का स्वागत किया था।
प्रो. ख्याला ने कहा कि नाम बदलने पर विचार हो सकता है लेकिन अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद अचानक उठाई जा रही आपत्तियों के पीछे पूर्णतः राजनीतिक उद्देश्य सक्रिय हैं। "सहिबज़ादे बाबा थे, बाल नहीं"-यह तर्क भी असंगत है, क्योंकि उनकी शहादतें बाल अवस्था में हुईं। यदि 'बाल' शब्द से सहिबज़ादों के सम्मान में कमी आती है तो क्या हमें यह भूल जाना चाहिए कि गुरु हरिकृष्ण जी महाराज आज भी 'बाला प्रीतम' के रूप में पूजे जाते हैं?गुरु साहिबानों और इतिहास में 'बाल' शब्द के प्रयोग के अनेक संदर्भ देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि 'बाल' शब्द किसी सम्मान में कमी नहीं लाता, बल्कि उस मासूम उम्र में दिए गए अतुलनीय बलिदान को और उजागर करता है। यदि 'बाल' शब्द से साहिबज़ादों के मान-सम्मान में किसी प्रकार की कमी अनुभव होती है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री गुरु हरिकृष्ण जी महाराज आज भी समस्त संगत के लिए 'बाला प्रीतम ही हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि 'बाल' शब्द साहिबज़ादों की महिमा या सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी नहीं लाता, बल्कि उनकी उस निष्कलंक, कोमल बाल अवस्था में दी गई असाधारण और अद्वितीय शहादत को और अधिक उजागर करता है।
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