अलीराजपुर, फरवरी 26 -- मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव अलीराजपुर जिले के चंद्रशेखर आजाद नगर भाबरा में 27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद की शहादत तिथि पर आजाद को श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुचेंगे।
भारतीय इतिहास में 27 फरवरी वह गौरवपूर्ण दिन है, जब महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। उनका जीवन साहस, त्याग और अटूट देशभक्ति का अनुपम उदाहरण है। वे उन वीर सपूतों में से थे, जिन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए, परंतु अंग्रेजों के सामने कभी नहीं झुके।
चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। जब उनसे उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने निर्भीक होकर उत्तर दिया- "मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और निवास स्थान जेलखाना।" उनकी निर्भीकता से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें 'आजाद' कहना शुरू कर दिया।
असहयोग आंदोलन के बाद उन्होंने क्रांतिकारी मार्ग अपनाया और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए। वे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष करने लगे। काकोरी कांड और सांडर्स वध जैसी घटनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका उद्देश्य केवल एक था "भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराना"।
चंद्रशेखर आजाद ने यह संकल्प लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएंगे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (वर्तमान में आजाद पार्क) में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने वीरता से मुकाबला किया और अंत में अपनी अंतिम गोली स्वयं को मार ली, ताकि वे शत्रुओं के हाथों में न पड़ें। इस प्रकार उन्होंने अपने वचन को निभाते हुए वीरगति प्राप्त की।
आजाद का जीवन हमें सिखाता है कि देशप्रेम और आत्मसम्मान सर्वोपरि है। उनका त्याग और बलिदान सदैव युवाओं को प्रेरित करता रहेगा। वे न केवल एक महान क्रांतिकारी थे, बल्कि साहस और आत्मबल के प्रतीक भी थे। भारतवर्ष सदैव उनके ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
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