हैदराबाद , दिसंबर 19 -- अभिनेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश राज ने शुक्रवार को कहा कि भाषा की पहचान, गौरव और अस्तित्व से गहराई से जुड़ी हुई है तथा क्षेत्रीय भाषाओं एवं संस्कृतियों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

श्री राज ने हैदराबाद की डॉ. बी. आर. अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी के कला संकाय के राष्ट्रीय सेमिनार "दक्षिण भारतीय भाषाएं : पहचान और राजनीति" के दौरान कहा कि हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा से प्यार होता है। कई भाषाएं सीखना महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरी भाषाओं पर एक भाषा थोपना अस्वीकार्य है। दक्षिणी राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं पर लगातार दबाव पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि स्थानीय भाषा और संस्कृति को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश का कड़ा विरोध किया जायेगा।

इस मौके पर पूर्व आंध्र ज्योति संपादक और लेखक डॉ. के. श्रीनिवास ने कहा कि दक्षिण भारतीय भाषाई राजनीति को संवैधानिक और ऐतिहासिक ढांचे के भीतर समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में भाषा न सिर्फ पहचान के निशान के रूप में काम करती है, बल्कि शिक्षा और सत्ता तक पहुंच से जुड़े राजनीतिक बुनियादी ढांचे के रूप में भी काम करती है।

यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. घंटा चक्रपाणि ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय उत्तर भारत के खिलाफ नहीं है, बल्कि भाषा, संस्कृति और निधि आवंटन से संबंधित अन्याय पर सवाल उठाने का अधिकार रखता है जो दक्षिणी राज्यों को प्रभावित करता है।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुईं प्रसिद्ध लेखिका और कार्यकर्ता डॉ. मीना कंदसामी ने आत्मनिर्णय में भाषा की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने भाषाई पहचान में छिपे प्रतिरोध की एक शक्तिशाली मिसाल के रूप में तमिल मुक्ति आंदोलन का हवाला दिया।

सेमिनार में तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख बुद्धिजीवियों ने भाग लिया, जिन्होंने दक्षिण भारतीय भाषाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संरक्षण की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।

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