ग्रेटर नोएडा , फरवरी 02 -- उत्तर प्रदेश में जिला गौतमबुद्धनगर परिक्षेत्र ग्रेटर नोएडा स्थित सूरजपुर कलेक्ट्रेट में क्षत्रिय करणी सेना द्वारा राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से संगठन ने यूजीसी एक्ट,रेगुलेशंस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे छात्रों के हितों के विपरीत बताया और इसमें बदलाव अथवा इसे बैन करने की मांग की।
क्षत्रिय करणी सेना नोएडा इकाई के पदाधिकारी और कई कार्यकर्ता सोमवार को कलेक्ट्रेट पहुंचे।
जहां संगठन का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने कहा कि ज्ञापन में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी के वर्तमान प्रावधानों के कारण छात्रों के अधिकारों का कहीं न कहीं हनन हो रहा है और इससे छात्रों की मानसिक स्थिति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यदि यूजीसी नियमों में आवश्यक संशोधन नहीं किए गए तो स्वर्ण समाज सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेगा।
संगठन ने स्पष्ट किया कि यदि कोई सवर्ण छात्र जातिगत भेदभाव का दोषी पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी छात्र को व्यक्तिगत रंजिश, दुर्भावना या झूठे आरोपों के माध्यम से फँसाया जाता है, तो ऐसे मामलों में आरोप लगाने वाले के खिलाफ भी समान रूप से कड़ी कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए। कानून का दुरुपयोग न्याय नहीं, बल्कि अन्याय को बढ़ावा देता है।
ज्ञापन में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि कोई ओबीसी वर्ग का छात्र एससी,एसटी वर्ग के छात्र के साथ जातिगत भेदभाव करता है, तो उसके विरुद्ध स्पष्ट कार्रवाई का प्रावधान नियमों में क्यों नहीं है? क्या भेदभाव केवल एक ही दिशा में संभव है? संगठन का कहना है कि सामाजिक वास्तविकता यह है कि भेदभाव हर स्तर और हर वर्ग में हो सकता है, जिसे कानून में समान रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
करणी सेना ने यह भी आपत्ति जताई कि नए नियमों में ओबीसी वर्ग को पीड़ित पक्ष के रूप में सम्मिलित किया गया है, जिससे सामान्य (जनरल) वर्ग को अप्रत्यक्ष रूप से दोषी मान लेने की भावना उत्पन्न होती है। न्याय व्यवस्था तथ्यों, निष्पक्ष जांच और प्राकृतिक न्याय पर आधारित होनी चाहिए, न कि पूर्वाग्रह पर।
संगठन ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान समाज की जड़ होते हैं, जिनका उद्देश्य समानता, समावेश और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन और अविश्वास को बढ़ावा देना। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कानून और नियम संविधान की मूल भावना और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2012 में बनाए गए नियमों में यह संतुलन मौजूद था कि यदि आरोप झूठे पाए जाते हैं या फँसाने की मंशा सिद्ध होती है, तो जुर्माने और कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन यूजीसी रेगुलेशंस -2020 में इस संतुलन का समाप्त होना अत्यंत चिंताजनक है।
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