वाराणसी , मार्च 19 -- धार्मिक नगरी काशी में ज्योतिषपीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने नव संवत्सर 'रौद्र' (विक्रमी 2083) के पावन अवसर पर समस्त विश्व के सनातन धर्मावलंबियों के नाम अपना वार्षिक संदेश जारी किया है। शंकराचार्य जी महाराज ने नव संवत्सर पर सनातनी पंचांग का विमोचन भी किया। प्रातःमंगलम् कार्यक्रम के 20वें वार्षिकोत्सव पर शंकराचार्य घाट पर बटुकों द्वारा नववर्ष के नव सूर्य को प्रथम अर्घ्य दिया गया।
शंकराचार्य जी ने कहा, "माँ गंगा में नाव पर मांसाहार का सेवन घोर पाप है।" वहीं कुछ लोग गंगा में क्रूज चलाकर तैरता हुआ होटल ही बना रहे हैं। लोगों को वहां ठहराया जा रहा है और उसमें भी अनाचार हो रहा है। आगे उन्होंने कहा कि क्रूज बनाकर होटल की तरह गंगा जी में चलाना सही नहीं है। उसमें रहकर लोगों को अपवित्रता करने की छूट नहीं देनी चाहिए। गंगा को कमाई का साधन बना दिया तो वो माई कहाँ रह गई!आपकी कमाई हो रही है तो उसमें बहुत कुछ आता है। पहले की नावों में नाविकों द्वारा खुली और पारदर्शी व्यवस्था होती थी। अब क्रूज में कोई भी कुछ भी करे, आपने व्यवस्था बना दी है। जब आपने माहौल बना दिया तो नाविक भी पैसा लेकर सब कुछ करने दे रहा है। माई को कमाई का साधन बनाने की कोशिश विगत कई वर्षों से की जा रही है। इसी का दुष्परिणाम है कि गंगा में नाव पर लोगों ने मांसाहार किया। यह सरकार गौ-ब्राह्मण सनातनी समाज के विरुद्ध है। यह कालनेमी है।
शंकराचार्य जी ने अपने संदेश में ज्योतिषपीठारोहण के साढ़े तीन वर्षों की यात्रा का विवरण प्रस्तुत करते हुए देश की राजनीति और वैश्विक संघर्षों पर धर्म-सम्मत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
उन्होने बताया कि 12 सितंबर 2022 को पीठ का उत्तरदायित्व संभालने से लेकर 19 मार्च 2026 के सूर्योदय तक कुल 1284 दिन (3 वर्ष, 6 मास, 1 सप्ताह, 4 दिन) का समय धर्म की मर्यादा और लोक-कल्याण हेतु समर्पित रहा है। महाराजश्री ने बताया कि जगद्गुरुकुलम् काशी के निकट वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के वैश्विक केंद्र का निर्माण तेज गति से जारी है। सवा लाख शिवलिंग मन्दिर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में सामूहिक अनुष्ठान की शक्ति का प्रतीक है और यह मन्दिर अपने अंतिम चरण में है।
उन्होंने बताया कि धर्म-जागृति यात्रा में संपूर्ण भारत में दो लाख किलोमीटर से अधिक की अनवरत यात्रा संपन्न हुई है। गौ-प्रतिष्ठा अभियान में छह करोड़ आहुतियों वाला महायज्ञ, देशव्यापी ध्वज स्थापना यात्रा और वृन्दावन से दिल्ली तक की पदयात्रा द्वारा जन-चेतना का विस्तार किया गया।
राजनीति को धर्म के अनुशासन में लाने हेतु महाराजश्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि अब हिंदू समाज केवल 'वोट बैंक' नहीं रहेगा। उन्होंने प्रत्येक भारतीय को 'सनातनी राजनीति' करने और 'गो-मतदाता' बनने की प्रेरणा दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातनी मत केवल उसे प्राप्त होगा जो गौ-माता को 'राष्ट्रमाता' का विधिक सम्मान दिलाने और गोवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का साहस दिखाएगा।
विश्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर पूज्य महाराजश्री ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का न्यायपूर्ण विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने उद्घोषित किया- "किसी भी स्वतंत्र देश की संप्रभुता पर आक्रमण करना घोर अन्याय और अधर्म है।" उन्होंने साम्राज्यवादी विस्तारवाद को मानवता के लिए विनाशकारी बताते हुए विश्व शांति हेतु शास्त्र-सम्मत मर्यादा का आह्वान किया।
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