अगरतला , जनवरी 29 -- त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ माणिक साहा ने राज्य की आदिवासी समुदाय की भाषा कोकबोरोक की लिपि पर पांच दशक से चली आ रही बहस को लेकर साफ-साफ कहा है कि इस भाषा के लिये 'रोमन लिपि' की कोई जगह नहीं है।
डॉ साहा ने इस बात को दोहराया कि इस मुद्दे पर कोई रियायत नहीं दी जाएगी। उन्होंने कोकबोरोक भाषी आबादी से आग्रह किया कि वे या तो 'देवनागरी लिपि' को अपनाएं या अपनी स्वयं की एक नयी लिपि तैयार करें। इसके साथ ही उन्होंने रोमन लिपि अपनाने के विचार को दृढ़ता से खारिज कर दिया।
यह पहली बार है जब किसी वर्तमान मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर इतना कड़ा और साहसी रुख अपनाया है। पिछले 50 वर्षों में यह लिपि विवाद कई आंदोलनों, सिफारिशों और राजनीतिक वार्ताओं का केंद्र रही है, लेकिन पहले किसी भी नेता ने इस तरह का निश्चित रूख नहीं अपनाया था।
कोकबोरोक भाषी समूह लंबे समय से रोमन लिपि लागू करने की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क है कि यह भाषा की ध्वन्यात्मक विशेषताओं के अधिक अनुकूल है। यह मांग उन रिपोर्टों के बाद फिर से तेज हो गई थी, जिनमें कहा गया था कि विभिन्न स्कूलों, विशेष रूप से सीबीएसई द्वारा संचालित स्कूलों के छात्रों को परीक्षा में अपनी उत्तर बंगाली लिपि में लिखने के लिए कहा गया था।
इस स्थिति ने समुदाय के कुछ वर्गों के बीच असंतोष पैदा कर दिया था। ऐतिहासिक रूप से देखें तो दशरथ देब ने भी मुख्यमंत्री रहते हुए रोमन लिपि की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया था। हालांकि, माना जाता था कि उनकी प्राथमिकता बंगाली लिपि थी।
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