खम्मम , जनवरी 20 -- तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री भट्टी विक्रमार्क मल्लू ने आरोप लगाया है कि देश में कॉरपोरेट और फासीवादी ताकतें धार्मिक भावनाओं के नाम पर आर्थिक और सामाजिक मुद्दों से ध्यान भटकाकर संसदीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर रही हैं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के शताब्दी समारोह के अवसर पर खम्मम जिला मुख्यालय में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए श्री भट्टी ने वामपंथी दलों से आह्वान किया कि वे एकजुट होकर आगे बढ़ें और उन ताकतों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष करें, जो "देश को गुमराह कर रही हैं" और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि वाम दलों को देश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा और शोषक बनाम शोषित की पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर अपने दृष्टिकोण का विस्तार करना होगा।

श्री भट्टी ने वैचारिक बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के जरिए समाजवाद पर ज़ोर दिया, वहीं जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर ने यह रेखांकित किया कि भारतीय समाज वर्ग से अधिक जाति पर आधारित है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, जब वर्ग संघर्ष को कमजोर किया जा रहा है और संसदीय व्यवस्था पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं, भारत में कम्युनिस्टों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि खम्मम हमेशा विविध विचारधाराओं का स्वागत करने वाला क्षेत्र रहा है और अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता है। उन्होंने देशभर से संगोष्ठी में पहुंचे वामपंथी नेताओं का स्वागत करते हुए कहा कि 100 वर्षों के इतिहास में भाकपा ने अनेक बलिदान दिए हैं और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई है।

उन्होंने याद दिलाया कि भारत को 1947 में आज़ादी मिली, जबकि तेलंगाना को एक साल बाद मुक्ति मिली। निज़ाम के खिलाफ कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए सशस्त्र संघर्ष ने "दुनिया को एक नया संदेश" दिया था।

श्री भट्टी ने कहा कि तेलंगाना भूमि और आजीविका से जुड़े ऐतिहासिक आंदोलनों के लिए जाना जाता है, जिनमें 'जमीन जोतने वाले की' आंदोलन और पुस्तकालय आंदोलन शामिल हैं। खम्मम, नलगोंडा और वारंगल जैसे जिलों में तीव्र जन संघर्ष हुए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासन के दौरान 1950 में किरायेदारी कानून लाया गया, इसके बाद 1970 का भूमि सुधार कानून, 20 सूत्री कार्यक्रम, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, मनरेगा और सूचना का अधिकार अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, जिनमें वाम दलों का समर्थन रहा।

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