तिरुवनंतपुरम , दिसंबर 17 -- केरल के स्थानीय स्वशासन मंत्री एम बी राजेश ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार एक प्रस्तावित विधेयक के माध्यम से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को खत्म करने का प्रयास कर रही है, जो ग्रामीण रोजगार प्रदान करने की केंद्र की जिम्मेदारी को त्यागने जैसा है।
श्री राजेश के अनुसार, यह विधेयक खर्च का 40 प्रतिशत बोझ राज्यों पर डालकर मनरेगा की मूल भावना पर प्रहार करता है। इसके कानून के तौर पर लागू होने के परिणामस्वरूप केरल को सालाना लगभग 1,600 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। उन्होंने इस विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की और चेतावनी दी कि यदि इन संशोधनों को लागू किया गया, तो केरल सबसे अधिक प्रभावित होने वाले राज्यों में से एक होगा।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तहत शुरू की गई मनरेगा योजना, अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक ग्रामीण व्यक्तियों को प्रति वर्ष 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है। केरल में यह योजना 2006 में शुरू की गई थी और 2008 तक पूरे राज्य में इसका विस्तार कर दिया गया था। यह राज्य में गरीबी उन्मूलन और आजीविका सुरक्षा का एक आधार स्तंभ बनकर उभरी थी।
केरल में वर्तमान में इस योजना के तहत 40.42 लाख पंजीकृत परिवार और 59.4 लाख पंजीकृत श्रमिक हैं, जिनमें 19.37 लाख सक्रिय परिवार और 22.61 लाख सक्रिय श्रमिक शामिल हैं। अकेले 2024-25 वित्तीय वर्ष में 9.07 करोड़ कार्यदिवसों के लिए 13.72 लाख परिवारों को रोजगार प्रदान किया गया।
मंत्री ने बताया कि इस दौरान 3,107.91 करोड़ रुपये की मजदूरी वितरित की गई, जबकि सामग्री और कुशल श्रम पर 713.05 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिससे कुल खर्च 4,011.53 करोड़ रुपये हो गया। उन्होंने बताया कि केरल ने 100 दिनों का रोजगार प्रदान करने में राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान हासिल किया है, जहां 2024-25 में 5,19,623 परिवारों को उनका पूरा हक मिला।
वर्तमान वित्तीय वर्ष (2025-26) के दौरान, 15 दिसंबर तक 5.52 करोड़ कार्यदिवसों के लिए 11.87 लाख परिवारों को रोजगार दिया गया, जिस पर 2,401.79 करोड़ रुपये खर्च हुए।
श्री राजेश ने मनरेगा कार्यान्वयन में केरल को एक राष्ट्रीय मॉडल बताते हुए कहा कि राज्य औसत कार्यदिवस, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों की भागीदारी और 100 दिन का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या जैसे संकेतकों में लगातार आगे रहा है।
मंत्री ने कहा कि केरल ने शत-प्रतिशत 'सोशल ऑडिट' पूरा करके और सभी जिलों में लोकपाल नियुक्त करके पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की है।
श्री राजेश ने आरोप लगाया कि इस बेहतरीन रिकॉर्ड के बावजूद, केंद्र ने अपनी वित्तीय सहायता में लगातार कमी की है। केरल को मिलने वाला केंद्रीय आवंटन 2022-23 में 3,854.68 करोड़ रुपये से घटकर 2023-24 में 3,221.13 करोड़ रुपये और 2024-25 में 3,212.06 करोड़ रुपये रह गया। 2025-26 में अब तक केवल 2,928.34 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। कार्यदिवसों का प्रारंभिक आवंटन भी पिछले वर्षों के छह करोड़ से घटाकर इस वर्ष पांच करोड़ कर दिया गया है, जबकि केरल हर साल अपने आवंटन से अधिक लक्ष्य हासिल करता रहा है।
मंत्री ने कहा कि अतिरिक्त कार्यदिवस उत्पन्न करने की केरल की क्षमता 2005 के अधिनियम में 'राज्य-अनुकूल' प्रावधानों के कारण संभव हुई थी, जिसे नया विधेयक बदलने की कोशिश कर रहा है।
श्री राजेश ने उन दावों का खंडन किया कि प्रस्तावित विधेयक गारंटीकृत रोजगार को बढ़ाकर 125 दिन करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लाभ केवल केंद्र द्वारा अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्रों पर लागू होगा, जिससे राज्य के बड़े हिस्से बाहर हो सकते हैं।
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