तिरुवनंतपुरम , फरवरी 04 -- केरल विधानसभा ने बुधवार को केंद्र सरकार के खिलाफ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें राज्य के प्रति केंद्र के "लगातार उपेक्षापूर्ण और भेदभावपूर्ण रवैये" पर गहरी चिंता और कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है।
मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने नियम 118 के तहत यह प्रस्ताव पेश करते हुए केंद्र सरकार से अपनी नीतियों की तत्काल समीक्षा करने और संघीय ढांचे के संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान करने का आह्वान किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर तभी सम्मान मिल सकता है, जब देश के सभी राज्य सुरक्षित, विकसित और समृद्ध हों। राज्यों को कमजोर करने का कोई भी प्रयास अंततः राष्ट्र को कमजोर करेगा।
प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था के माध्यम से एक मजबूत संघीय ढांचे की परिकल्पना करता है, लेकिन हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने केरल की कई जायज और लंबे समय से लंबित मांगों की लगातार अनदेखी की है, जिससे राज्य की जनता में व्यापक निराशा फैली है।
विधानसभा ने कहा कि वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त विकास मॉडल प्रस्तुत करने वाले राज्य की इस तरह की उपेक्षा लोकतांत्रिक और संघीय मूल्यों पर गंभीर आघात है और इससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास कमजोर होने का खतरा है। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि हाल के केंद्रीय बजट संविधान में निहित संतुलित क्षेत्रीय विकास के सिद्धांत से लगातार विचलित होते जा रहे हैं।
विधान सभा ने केरल में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की स्थापना की अपनी पुरानी मांग दोहराई। राज्य द्वारा उपयुक्त भूमि चिन्हित करने और अधिकांश प्रक्रियाएं पूरी करने के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है और यह मुद्दा लगातार पिछले कई केंद्रीय बजट में भी नजरअंदाज किया गया है। विधानसभा ने बिना किसी और देरी के केरल को एम्स स्वीकृत करने की मांग की।
प्रस्ताव में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में किए गए बदलावों पर भी गंभीर चिंता जताई गई। योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में अग्रणी राज्यों में शामिल केरल को केंद्र की हिस्सेदारी 100 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत किए जाने के कारण लगभग 3,800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
इसके साथ ही 2026-27 के केंद्रीय बजट में इस योजना के लिए आवंटन को 88,000 करोड़ रुपये से घटाकर 30,000 करोड़ रुपये किए जाने की आलोचना करते हुए चेतावनी दी गई कि इससे केरल की कल्याणकारी योजनाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी।
रेल विकास के मुद्दे पर विधानसभा ने कहा कि केरल का रेल नेटवर्क अब भी कम गति और अपर्याप्त क्षमता से जूझ रहा है। 573 किलोमीटर लंबे तिरुवनंतपुरम-कासरगोड मार्ग को तय करने में अब भी लगभग 13 घंटे लगते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
प्रस्ताव में राज्य में हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की तत्काल आवश्यकता दोहराई गई, लेकिन कहा गया कि इस संबंध में केंद्र को भेजे गए कई प्रतिवेदनों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। तिरुवनंतपुरम-मंगलूरु के बीच नई रेल लाइनों के सर्वे और प्रस्तावित रेल कोच फैक्ट्री को भी मंजूरी नहीं दी गई है।
विधानसभा ने विजिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह परियोजना के प्रति केंद्र के रवैये को भी भेदभावपूर्ण करार दिया। विधानसभा सभा ने कन्नूर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को विदेशी एयरलाइनों के लिए "प्वाइंट ऑफ कॉल" का दर्जा देने से केंद्र के इनकार की भी आलोचना की, जबकि इस संबंध में प्रधानमंत्री सहित कई स्तरों पर बार-बार अनुरोध किए गए हैं। आपदा राहत के मामले में भी केंद्र सरकार की भूमिका पर कड़ी आपत्ति जताई गई। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि मुंडक्कै-चूरलमाला आपदा के बाद पुनर्वास के लिए पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया गया और केंद्रीय कानूनों में संशोधन कर आपदा पीड़ितों के लिए ऋण माफी के प्रावधान हटा दिए गए।
विधानसभा ने यह भी स्मरण कराया कि वायनाड के आपदा प्रभावित लोगों के मामले में उच्च न्यायालय ने भी केंद्र के रुख पर कड़ी टिप्पणियां की थीं। प्रस्ताव में कहा गया कि केंद्र सरकार ने केरल की उधारी सीमा में भारी कटौती कर राज्य को वित्तीय रूप से और जकड़ दिया है। 2026-27 वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में राज्य की उधारी सीमा में 5,944 करोड़ रुपये की कटौती की गई, जबकि गारंटी सिंकिंग फंड के तहत 3,323 करोड़ रुपये और घटाए गए।
सोलहवें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान समाप्त किए जाने के फैसले को भी विधानसभा ने बड़ा झटका बताया। प्रस्ताव के अनुसार, पंद्रहवें वित्त आयोग की अवधि के दौरान केरल को मिले लगभग 53,000 करोड़ रुपये के राजस्व घाटा अनुदान से राज्य अब वंचित हो जाएगा। इसके अलावा 965.16 करोड़ रुपये के आईजीएसटी बकाए रोके जाने, जीएसटी दरों में कटौती से हुए राजस्व नुकसान की भरपाई न किए जाने और राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण लागत में राज्य के 25 प्रतिशत हिस्से को उधारी सीमा में शामिल करने की अनुमति न देने को भी भेदभावपूर्ण करार दिया गया।
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