भोपाल , फरवरी 18 -- पूर्व सदस्य कृषि सलाहकार परिषद एवं किसान नेता केदार सिरोही ने मध्यप्रदेश सरकार के बजट 2026-27 को किसानों के साथ विश्वासघात करार देते हुए कहा है कि कृषि वर्ष घोषित किए जाने के बावजूद बजट में किसानों को हिस्सेदारी से "छुट्टी पर" रखा गया है और कृषि संकट से बाहर निकालने का कोई स्पष्ट रोडमैप नजर नहीं आता।

कृषि अर्थशास्त्री केदार सिरोही ने कहा कि वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा प्रस्तुत बजट में नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी द्वारा किसानों, गरीबों, नारी शक्ति और युवाओं से किए गए प्रमुख वादों का समुचित उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस वर्ष को सरकार ने कृषि वर्ष घोषित किया, उसी वर्ष के बजट में कृषि क्षेत्र की मूल समस्याओं पर ठोस प्रावधान नहीं किए गए।

सिरोही ने कहा कि पिछले तीन वर्षों के सरकारी आंकड़ों और वर्तमान बजट दस्तावेजों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि किसानों की मेहनत से कृषि उत्पादन बढ़ा है, किंतु कृषि संकट और गहराया है। खेती की लागत में वृद्धि, अमानक कृषि आदानों की समस्या, बढ़ता कर्ज, आत्महत्या की घटनाएं, विफल बाजार व्यवस्था, फसल बीमा एवं मुआवजे में अनियमितता, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान में नवाचार की कमी जैसे मुद्दों पर बजट मौन है।

उन्होंने कहा कि सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण किसान परिवारों की आय का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा इन बुनियादी सुविधाओं पर खर्च हो रहा है। शिक्षित किसान पुत्र बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है, जिससे सामाजिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

मौजूदा मंडी और बाजार व्यवस्था को किसानों के लिए प्रतिकूल बताते हुए उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत और मुआवजा प्रक्रियाएं केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाती हैं।

सहकारी समितियों और संस्थाओं की बदहाल स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इनके पुनरुद्धार के लिए बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया। खाद और ऋण की उपलब्धता प्रभावित हो रही है, जबकि कर्जमाफी को लेकर भी स्पष्ट नीति नहीं है। डेयरी और पशुपालन क्षेत्र में भी वास्तविक सुधार के बजाय केवल घोषणाएं दिखाई देती हैं।

हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यद्यपि गेहूं, चावल और डेयरी क्षेत्र को सुरक्षित रखने का दावा किया गया है, लेकिन मध्यप्रदेश की प्रमुख फसलों जैसे सोयाबीन, मक्का, कपास, सरसों, मूंगफली, ज्वार और दलहन पर संभावित प्रभाव को लेकर कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है।

उन्होंने कहा कि मालवा-निमाड़ क्षेत्र की प्रमुख फसलें जैसे केला, लहसुन, प्याज और सब्जियां भी बजट में उपेक्षित हैं। भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों को वास्तविक मुआवजा नहीं मिल रहा है, जिससे विस्थापित परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो रहा है।

सिरोही ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण में जीएसडीपी वृद्धि के दावे किए गए हैं, किंतु राज्य पर कर्ज का बोझ लगभग 4.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। केंद्र से करों की हिस्सेदारी में कमी और लंबित भुगतान पर भी सरकार ने स्पष्ट रणनीति प्रस्तुत नहीं की है।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह बजट किसान विरोधी है और किसानों से किए गए वादों को निभाने की इच्छाशक्ति सरकार में नहीं दिखती। उन्होंने मांग की कि सरकार कृषि क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का आकलन कर व्यापक राहत पैकेज और दीर्घकालिक नीतिगत सुधारों के साथ सामने आए, ताकि किसानों को मौजूदा संकट से बाहर निकाला जा सके।

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