दरभंगा , दिसंबर 11 -- बिहार के प्रतिष्ठित कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर दर्शन विभाग तथा महर्षि सांदीपनि वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्त्वावधान में गुरुवार को "वैदिक मन्त्राणां दार्शनिकम् विश्लेषणम्" विषय पर त्रिदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का आगाज हुआ।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० लक्ष्मीनिवास पाण्डेय ने अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा का मूल स्रोत वेद है। उन्होंने बताया कि वेद अपौरुषेय हैं-इतने विस्तृत ग्रन्थ लिखने के बाद भी व्यासजी ने अपना नाम न देकर अद्वितीय निःस्वार्थ परम्परा का उदाहरण रखा। उन्होंने पुरुषसूक्त में वर्णित विराट पुरुष को आज के 140 करोड़ भारतीयों के 'राष्ट्रपुरुष' के रूप में समझने की प्रेरणा दी। उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीनकाल में वेदाध्ययन एवं शास्त्रार्थ में स्त्रियों की विशिष्ट उपस्थिति मिलती है, जिसका उल्लेख अनेक वैदिक साहित्य में है।

संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि मिथिला का वर्णन वेदकाल से ही मिलता है। गार्गी जैसी विदुषी ने इसी नगर में शास्त्रार्थ किया था। उन्होंने गौतम, अष्टावक्र आदि मनीषियों की इस भूमि से संबद्ध परम्परा का उल्लेख किया। उन्होंने वैशाली के वैदिक-सांस्कृतिक महत्व तथा ब्रिटिश शासनकाल में संस्कृत को राजभाषा बनाने के प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो० कृष्णकान्त शर्मा ने कहा कि श्रुति-स्मृति-विरोध की स्थिति में श्रुति को प्रामाणिक माना जाता है। उन्होंने वेद के चार विभागों-मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद-का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया तथा पुरुषसूक्त के दार्शनिक महत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि सूक्त में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज की समन्वित संरचना का संकेत है।

विशिष्ट अतिथि एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. उमेश शर्मा ने 'वेद' शब्द की व्युत्पत्ति, वेदांत तथा व्याकरण की वैदिक परम्परा में श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला। उन्होंने मन्त्रार्थ, सिद्धि-प्रक्रिया और अद्वैत-दृष्टि के मूल तत्वों की विस्तार से व्याख्या की।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वेद विज्ञान केन्द्र के संस्थापक तथा पूर्व वेदविभागाध्यक्ष प्रो. उपेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि समस्त पदार्थों में ईश्वर-दृष्टि ही वेद का मुख्य उपदेश है। उन्होंने मीमांसाओं में प्रतिपादित 'अपूर्व सिद्धान्त', यज्ञ के उद्देश्य, चित्तवृत्ति-शोधन के तीन आयाम-आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक-तथा 'त्याग' को देवत्व की प्राप्ति का मार्ग बताया।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. ब्रजेशपति त्रिपाठी ने किया। विषय-प्रवर्तन संयोजक दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ. धीरज कुमार पाण्डेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सह संयोजक डॉ. सुधीर कुमार ने किया।

इससे पहले विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा मंगलाचरण तथा शिक्षा-शास्त्र विभाग की छात्राओं ने कुलगीत प्रस्तुत किया। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ० साधना शर्मा ने किया। विश्वविद्यालय के प्रो० निशिकांत सिंह ने अवगत कराया कि कार्यक्रम दो सत्रों में सम्पन्न हुआ।

इस वैदिक संगोष्ठी के द्वितीय सत्र का आयोजन दोपहर 2 बजे से 5 बजे तक सम्पन्न हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति एवं महर्षि वेदव्यास वेदविद्यापीठ, काशी के वरिष्ठ विद्वान प्रो. रामकिशोर मिश्र ने की।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित