बेंगलुरु , मार्च 27 -- कर्नाटक सरकार ने उच्च न्यायालय में अपनी हाल ही में जारी की गई मासिक धर्म अवकाश नीति का बचाव करते हुए कहा है कि कि महिलाओं के लिए सवेतन मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य करने वाली इस नीति का वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ आधार है।
सरकार की ओर से यह दलीलें इस सप्ताह की शुरुआत में 'कर्नाटक एम्प्लॉयर्स एसोसिएशन बनाम कर्नाटक सरकार' मामले में न्यायाधीश अनंत रामनाथ हेगड़े की पीठ के सामने दी गयीं। राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे महाधिवक्ता शशि किरण शेट्टी ने कहा कि महिला कर्मचारियों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को इस नीति का विरोध करने वाले नियोक्ताओं द्वारा बताई गई वित्तीय चिंताओं से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई उद्योगों में जो महिलाएं मासिक धर्म अवकाश लेती हैं, उन्हें उस दिन का वेतन नहीं मिलता, जिससे वे इस अवकाश का लाभ उठाने से हिचकती हैं।
गौरतलब है कि सरकार ने दिसंबर 2025 में मासिक धर्म अवकाश नीति जारी की थी, जिसके तहत 18 से 52 वर्ष की आयु की महिला कर्मचारियों के लिए हर महीने एक सवेतन अवकाश अनिवार्य किया गया था। यह नियम उन प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जो फैक्ट्री अधिनियम, 1948, कर्नाटक दुकान और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान अधिनियम, 1961, बागान श्रम अधिनियम, 1951, बीड़ी और सिगार श्रमिक अधिनियम, 1966 और मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम, 1961 जैसे कानूनों के तहत आते हैं। इस नीति को कर्नाटक एम्प्लॉयर्स एसोसिएशन, बेंगलुरु होटल एसोसिएशन और एसएएसएमओएस एचईटी टेक्नोलॉजीज तथा अविराटा डिफेंस सिस्टम सहित कई कंपनियों के प्रबंधन द्वारा चुनौती दी गयी है। उन्होंने वित्तीय बोझ का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या ऐसी नीति को किसी कार्यकारी अधिसूचना के माध्यम से लागू किया जा सकता है।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह नीति भेदभावपूर्ण है। वहीं, इसके बचाव पक्ष में बेंगलुरु महिला वकील संघ ने मासिक धर्म के दौरान होने वाले लक्षणों जैसे ऐंठन, जी मिचलाना, भावनात्मक तनाव और हार्मोनल असंतुलन को उजागर किया। उन्होंने तर्क दिया कि मासिक धर्म के लिए सवेतन अवकाश देना भेदभावपूर्ण नहीं है, क्योंकि प्रजनन आयु वर्ग की महिलाएं अलग व्यवहार के लिए एक वैध श्रेणी बनाती हैं।
संघ का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. रविवर्मा कुमार कर रहे हैं। प्रो. कुमार ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश से वंचित करना महिलाओं को उनकी आजीविका से वंचित करना होगा और भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित सामाजिक न्याय के वादे को कमजोर करेगा।
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ ने भी इस नीति का समर्थन किया है और महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बनाए रखने के लिए मासिक धर्म अवकाश की तुलना बाल देखभाल अवकाश से की। उनके वकील ने तर्क दिया कि सवेतन अवकाश महिलाओं को अपनी प्रजनन संबंधी पसंद का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने में सक्षम बनाता है। स्वास्थ्य जोखिमों तथा संभावित एंटीबायोटिक प्रतिरोध का हवाला देते हुए दर्द निवारक दवाओं पर निर्भर रहने के प्रति आगाह किया।
अखिल भारतीय केंद्रीय ट्रेड यूनियन परिषद का प्रतिनिधित्व कर रहीं अधिवक्ता मैत्रेयी कृष्णन ने बताया कि भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी 35.3 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक औसत 47 प्रतिशत है। उन्होंने लाखों महिलाओं को प्रभावित करने वाले, कम पहचाने गए और कम इलाज वाले मासिक धर्म संबंधी विकारों को उजागर किया, और कहा कि समानता सुनिश्चित करने के लिए मासिक धर्म अवकाश नीतियों जैसे प्रणालीगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं।
इस मामले की सुनवाई 24 से 26 मार्च तक हुई, और अब एक अप्रैल को फिर से सुनवाई के लिए निर्धारित है।
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