बेंगलुरु , फरवरी 02 -- कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 'कर्नाटक नफरती भाषण और नफरत संबंधी अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025' को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख लिया है।

राज्यपाल ने संवैधानिक, कानूनी और प्रक्रियागत चिंताओं का हवाला देते हुए इस विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ मंजूरी के लिए रोका है। यह विधेयक जिसे दिसंबर 2025 में बेलगावी में शीतकालीन सत्र के दौरान राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किया गया था, अब राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने तक कानून नहीं बनेगा।

राज्यपाल के राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि विधेयक के कई प्रावधान संवैधानिक मुद्दे उठाते हैं, जिसमें नफरत का भाषण की एक अस्पष्ट और बहुत व्यापक परिभाषा शामिल है जो सामान्य भाषण, बौद्धिक आलोचना और अकादमिक चर्चा को भी अपराध बना सकती है और जिसकी व्यक्तिपरक व्याख्या की जा सकती है।

उठाई गई चिंताओं में कार्यकारी शक्तियों का विस्तार शामिल है, जिसमें नफरत फैलाने वाली मानी जाने वाली ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने या हटाने का अधिकार और समूहों या संगठनों की गतिविधियों से जुड़े नफरत का भाषण या नफरत का अपराध के लिए सामूहिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी की शुरुआत शामिल है।

यह विधेयक सजाओं में भी काफी बढ़ोतरी करता है। कई अपराधों को जमानती से गैर-जमानती और गैर-संज्ञेय से संज्ञेय बनाता है, जिसमें पहली बार अपराध करने पर सात साल तक की कैद और बार-बार अपराध करने पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना शामिल है।

राज्यपाल कार्यालय को विधेयक का विरोध करते हुए लगभग 40 ज्ञापन मिले, जिसमें संभावित दुरुपयोग और अनचाहे परिणामों की चेतावनी दी गई थी और कानून पारित होने से पहले सिविल सोसायटी, मीडिया निकायों और संवैधानिक विशेषज्ञों के परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

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