बेंगलुरु , अप्रैल 25 -- कर्नाटक में अनुसूचित जाति के भीतर आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर सरकारी निर्णयों ने राज्य के दलित समुदायों के बीच दशकों पुराने 'वाम' बनाम 'दक्षिण' संघर्ष को फिर से हवा दे दी है।

मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल ने मौजूदा अनुसूचित जाति के 15 प्रतिशत आरक्षण के कोटे के भीतर एक संशोधित आंतरिक आरक्षण मैट्रिक्स को मंजूरी दी है। इसके तहत दलित वाम (श्रेणी 1) और दलित दक्षिण (श्रेणी 2) को 5.25 प्रतिशत-5.25 प्रतिशत और श्रेणी 3 को 4.5 प्रतिशत कोटा आवंटित किया गया है। श्रेणी 3 में 'स्पृश्य' और 59 खानाबदोश (अलेमारी) समुदाय शामिल हैं।

सरकार ने इस कदम को हालांकि समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए एक लंबे समय से प्रतीक्षित संतुलनकारी प्रयास के रूप में पेश किया है लेकिन इस घोषणा ने उन समूहों के बीच तनाव को फिर से भड़का दिया है, जिन्हें अब शिक्षा और रोजगार में अपने हिस्से के कम होने का डर सता रहा है।

इस चल रही बहस के केंद्र में 56,432 सरकारी पदों तक पहुंच का मुद्दा मुख्य है। सरकार ने साथ ही यह भी घोषणा की है कि नये फार्मूले के तहत नयी भर्ती अधिसूचनाएं जारी की जाएंगी। कोटा पुनर्गठन और नौकरियों के बीच इस सीधे जुड़ाव ने जमीनी स्तर पर प्रतिक्रियाओं को और तेज कर दिया है और विभिन्न गुट अब संशोधित प्रणाली के तहत अपनी संभावनाओं का नए सिरे से आकलन कर रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह सुधार दलित वाम समुदायों की दशकों पुरानी मांग को हल करने का एक प्रयास है। इन समुदायों का तर्क रहा है कि अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर अपेक्षाकृत अधिक उन्नत वर्गों ने लाभों का अधिक हिस्सा हथिया लिया है। इस पुनर्समायोजन ने हालांंकि अन्य समूहों विशेष रूप से श्रेणी 3 के भीतर के समुदायों को बेचैन कर दिया है। श्रेणी 3 में शामिल खानाबदोश समुदायों ने सामाजिक रूप से बेहतर स्थिति वाले वर्गों के साथ रखे जाने पर अपनी चिंता व्यक्त की है।

सरकार ने इन चिंताओं को दूर करने के प्रयास में श्रेणी 3 के भीतर एक उप-कोटा शुरू किया है, जिसके तहत हर पांच पदों में से एक पद अलेमारी समुदायों के लिए आरक्षित किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह सुरक्षा उपाय हाशिए पर पड़े खानाबदोश समूहों को दौड़ से बाहर होने से बचाने के लिए तैयार किया गया है। इसके प्रभावी होने की हालांकि असली परीक्षा इसके कार्यान्वयन के दौरान ही होगी।

उधर कर्नाटक विधान परिषद में विपक्ष के नेता चलवादी नारायणस्वामी ने राज्य सरकार के आंतरिक आरक्षण के फैसले की आलोचना करते हुए इसे मनमाना और अनुसूचित जाति समुदायों के लिए हानिकारक बताया।

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश कार्यालय जगन्नाथ भवन में एक संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाया कि सिद्दारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने यह निर्णय इस तरह से लिया है कि समुदायों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है, बिना किसी स्पष्ट या न्यायसंगत रूपरेखा के। उन्होंने दावा किया कि निर्णय लेने की प्रक्रिया के दौरान उपमुख्यमंत्री मौजूद नहीं थे, जिससे सरकार के भीतर संभावित आंतरिक मतभेदों का संकेत मिलता है।

यह नवीनतम फार्मूला लगातार सरकारों द्वारा एक व्यावहारिक आंतरिक आरक्षण मॉडल तक पहुंचने का पांचवां ऐसा प्रयास है, जो इस मुद्दे की राजनीतिक और सामाजिक जटिलता को रेखांकित करता है। पहले के ढांचे भी विरोध-प्रदर्शनों और जवाबी आंदोलनों का कारण बने थे और ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान कदम भी इसका कोई अपवाद नहीं है।

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