भदोही , दिसंबर 28 -- कभी पूर्वांचल के मैनचेस्टर के नाम से जाना जाने वाला उत्तर प्रदेश के भदोही जिले का कालीन आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।

कालीन तकनिकी विशेषज्ञ रहे 96 वर्षीय याकूब कुरैशी ने बताया कि मुगलकाल में शुरू हुआ भदोही में कालीन का निर्माण हमेशा फलता-फूलता रहा। यहां के हस्त निर्मित कालीनों की मांग पूरी दुनियां में रही है। खास तौर से मखमली और कलात्मक हस्त निर्मित कालीन का भदोही-मिर्जापुर में 90 फीसदी उत्पादन होता था। तब से अब तक अपनी इस यात्रा में भदोही का कालीन सफलता के कई मुकाम हासिल कर चुका है। भदोही के कालीन की मांग खाड़ी देशों के अलावा अमेरिका, यूरोपीय देशों में भी खूब है। भदोही हस्तनिर्मित मशहूर पर्शियन कारपेट के लिए अलग पहचान रखता है।

उन्होंने बताया कि 16वीं सदी के दौरान लिखी गई, आईने-ए-अकबरी के अनुसार बादशाह अकबर अपनी फौज के साथ शेरशाह सूरी राष्ट्रीय राजमार्ग से जा रहे थे। वहीं उनकी फौज के कुछ लोग पीछे छूट गए। जिन्होंने भदोही के आस-पास अपना डेरा डाल लिया। इन लोगों ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर कालीन बनाना शुरू किया। उस दौरान जो कालीन बने वो शाही कालीन कहलाए। वैसे विश्व में कालीन का इतिहास 5000 साल पुराना है। 3000 ईसा पूर्व विश्व में सबसे पहले मिश्र में कालीन बनी थी। वर्तमान में इस क्षेत्र में बनने वाले कालीन को जीआई टैग दिया गया है, जिसके कारण इस क्षेत्र को विशिष्ट पहचान मिली हुई है।

भारत में निर्मित कालीन का 80 फीसदी भदोही से ही निर्यात किया जाता था। यहां से 73 देशों में कालीन का निर्यात किया जाता है। भदोही में गुच्छेदार, तिब्बती कालीन, पर्शियन कालीन और दरी के निर्माण का काम होता है।

शासन-प्रशासन के उपेक्षात्मक रवैए के कारण के कारण उद्योग कालीन परिक्षेत्र मीरजापुर-भदोही से खिसककर जम्मू, पानीपत, आगरा, दिल्ली व जयपुर सहित देश के अन्य भागों में खिसक चुका है। जहां कभी पूरे निर्यात का 80 फीसद कालीन भदोही में बनता था आज वह आंकड़ा 55 से 60 तक आकर सिमट चुका है। ढांचागत सुविधाएं फाइव स्टार होटल, चमचमाती सड़कों व सीधी विदेशी उड़ानों के अभाव के कारण विदेशी वायर भदोही आने के बजाय सीधे जम्मू कश्मीर पानीपत आगरा नोएडा व दिल्ली चले जाते हैं। जिसका सीधा असर कालीनों के निर्यात पर पड़ता है।

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