नयी दिल्ली , फरवरी 12 -- राज्यसभा ने गुरुवार को औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके साथ ही इस विधेयक पर संसद की मुहर लग गयी। इससे पहले गुरुवार को ही लोकसभा ने इसे मंजूरी दी थी।
इस विधेयक के जरिये सितंबर 2020 में संसद में पारित औद्योगिक संबंध संहिता में तीन पुराने कानूनों को वापस लिया जायेगा। ये तीन कानून व्यवसाय संघ अधिनियम 1926, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 हैं।
सदन में विधेयक पर हुई संक्षिप्त चर्चा का जवाब देते हुए श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने विपक्ष के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस संशोधन विधेयक के जरिये कानून में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है, सिर्फ उन तीन पुराने कानूनों को वापस लेने का प्रावधान संहिता में जोड़ा जा रहा है जिन्हें इसमें समाहित कर लिया गया था।
काम के घंटे आठ से बढ़ाकर 12 करने के आरोपों पर उन्होंने कहा कि नयी श्रम संहिताओं में सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम न लेने का प्रावधान है जो विश्व श्रम संगठन के अनुरूप है। इसमें न्यूनतम मजदूरी को अनिवार्य बनाया गया है जबकि पहले यह सिर्फ एक निर्देश था जिसका पालन करना या न करना राज्यों के ऊपर था।
उन्होंने कहा कि नये कानून में हर कर्मचारी को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य किया गया है जिससे कंपनी दुर्घटना होने पर कर्मचारी की वित्तीय सुरक्षा से मुकर नहीं सकती। महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन और रात में काम करने का अधिकार दिया गया है। ओवरटाइम के लिए दुगने वेतन का प्रावधान है।
विपक्ष पर राजनीति का आरोप लगाते हुए मंत्री ने कहा कि एक सर्वेक्षण कराया गया था जिसमें 60 प्रतिशत कर्मचारियों ने नये कानूनों को उनके हित में बताया था। उन्होंने कहा कि देश की तरक्की के लिए उद्योग और कर्मचारियों के बीच संतुलन होना चाहिये।
चर्चा में हिस्सा लेते हुए सदन में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि छह साल पहले पारित चारों श्रम संहिताएं श्रमिकों के अधिकार छीनने वाली हैं। इसने जरिये स्थायी नियुक्ति को समाप्त किया जा रहा है और काम के घंटे आठ से बढ़ाकर 12 किये जा रहे हैं।
कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा कि सरकार ने 23 सितंबर 2020 को इस विधेयक को बिना चर्चा के पारित किया था। यदि उस दिन चर्चा हुई होती तो विपक्ष जरूर बताता कि बिना पुराने कानून को वापस लिये नया कानून पारित नहीं किया जा सकता। अब उच्चतम न्यायालय के कहने पर यह संशोधन लाया गया है। उन्होंने कहा कि नये कानून पूरी तरह से मजदूरों के खिलाफ हैं।
तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन ने नये कानूनों को "कॉरपोरेट कोड" बताया और कहा कि इनके माध्यम से श्रमिक संगठन बनाने का अधिकार छीना गया है। द्रमुक के आर. गिरिराजन ने कहा कि नयी श्रम संहिताओं में श्रमिकों के हितों का ध्यान नहीं रखा गया है। हड़ताल और मिलकर अपनी मांग के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाने का अधिकार छीन लिया गया है।
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के अयोध्या रामी रेड्डी और अन्नाद्रमुक के एम. थंबीदुरै ने संशोधन विधेयक का समर्थन किया।
बीजू जनता दल के निरंजन बिशि, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वी. शिवदासन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पी. संदोष कुमार ने भी नये श्रम कानूनों को मजदूर विरोधी और कॉरपोरेट के हित में बताया।
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