वाराणसी , फरवरी 10 -- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग में आयोजित व्याख्यान में कनाडा की वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कृष्णा सिंह ने कहा कि ऑटोफैगी प्रक्रिया को बढ़ावा देकर हृदय रोगों और फाइब्रोटिक बीमारियों के उपचार की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। उन्होंने इसे भविष्य की चिकित्सकीय रणनीतियों के लिए एक मजबूत आधार बताया।

एसपीआरसी हॉल में आयोजित व्याख्यान के विषय , "एंडोथेलियल ऑटोफैगी: एंडएमटी-प्रेरित फाइब्रोसिस और एथेरोस्क्लेरोसिस के खिलाफ एक सुरक्षात्मक तंत्र" पर बोलते हुये डॉ. सिंह ने कहा कि ऑटोफैगी एक प्राकृतिक कोशिकीय प्रक्रिया है, जो क्षतिग्रस्त घटकों को हटाकर रक्त वाहिकाओं को स्वस्थ बनाए रखती है। यदि एंडोथेलियल कोशिकाओं में यह प्रक्रिया बाधित होती है तो एंडोथेलियल-टू-मेसेंकाइमल ट्रांजिशन (एंडएमटी) सक्रिय हो जाता है, जिससे कोशिकाएं फाइब्रोटिक गुण धारण कर लेती हैं और फाइब्रोसिस व एथेरोस्क्लेरोसिस जैसी बीमारियां बढ़ती हैं।

उन्होंने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और होमियोस्टेसिस बिगड़ता है, जो हृदय रोगों का प्रमुख कारण बनता है। एटीजी7 जीन की साइलेंसिंग पर आधारित इन विट्रो और इन विवो अध्ययनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ऑटोफैगी फ्लक्स में कमी से एंडोथेलियल कोशिकाओं में संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं। पशु मॉडलों में यह भी पाया गया कि ऑटोफैगी की कमी से फेफड़ों में फाइब्रोसिस, कोलेजन संचय और रक्त वाहिकाओं में हानिकारक कोलेस्ट्रॉल का जमाव बढ़ जाता है।

डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि यदि वैज्ञानिक तरीके से ऑटोफैगी को सक्रिय किया जाए तो हृदय रोगों की रोकथाम और उपचार में महत्वपूर्ण सफलता मिल सकती है।

वाराणसी में जन्मे डॉ. कृष्णा सिंह ने जर्मनी के हनोवर मेडिकल स्कूल से पीएचडी तथा टोरंटो विश्वविद्यालय से पोस्ट-डॉक्टरल शोध किया है। वर्तमान में वे वेस्टर्न यूनिवर्सिटी, कनाडा के मेडिकल बायोफिजिक्स विभाग में कार्यरत हैं। उनके शोध पत्र कई अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित हो चुके हैं और उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। व्याख्यान में विभाग के छात्र, शिक्षक एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की।

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