रायबरेली , जनवरी 29 -- मुंशीगंज स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायबरेली ने चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल करते हुए चार माह की एक बच्ची को नया जीवन दिया है। खीरो क्षेत्र की निवासी इस बच्ची में पाए गए दुर्लभ आनुवंशिक रोग स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) का समय रहते सफल उपचार किया गया।
एम्स के प्रवक्ता डॉ. नीरज श्रीवास्तव ने गुरुवार को बताया कि करीब तीन माह पूर्व सांस लेने में गंभीर परेशानी के चलते बच्ची को आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया था। प्रारंभिक जांच में निमोनिया की आशंका के चलते डॉ. नमिता मिश्रा, एसोसिएट प्रोफेसर के निर्देशन में उसे पीआईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। इलाज के दौरान चिकित्सकों को उसके हाथ-पैरों में अत्यधिक कमजोरी दिखाई दी।
परिजनों से जानकारी लेने पर सामने आया कि बच्ची की बड़ी बहन की भी तीन माह की उम्र में इसी तरह की समस्या से मृत्यु हो चुकी थी। इस पारिवारिक इतिहास को ध्यान में रखते हुए कराई गई आनुवंशिक जांच में बच्ची में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी की पुष्टि हुई। चिकित्सकों के अनुसार यह एक गंभीर रोग है, जिसमें मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली नसें प्रभावित होती हैं और समय के साथ स्थिति जानलेवा हो सकती है।
हालांकि एसएमए का इलाज अत्यंत महंगा होता है, लेकिन नई दवा रिसडिप्लाम के प्रयोग से बच्ची की हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ। करीब पांच सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद उसे ऑक्सीजन सपोर्ट पर लाया गया और अब वह सामान्य रूप से सांस ले रही है। डॉ. राजकुमार की महत्वपूर्ण भूमिका और बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युंजय कुमार के नेतृत्व में करीब तीन माह के उपचार के बाद बच्ची को स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज किया जा रहा है।
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