मुंबई , दिसंबर 19 -- रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की इस महीने के शुरू में हुई बैठक में सदस्यों ने निर्यात और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट को लेकर चिंता जताई थी और भविष्य के लिए रुख को तटस्थ बनाये रखने का निर्णय किया था।
केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को बैठक का विवरण जारी किया। इसके मुताबिक, रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा सहित सभी सदस्यों ने स्वीकार किया कि घरेलू स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर और मुद्रास्फीति के मोर्चे पर अर्थव्यवस्था के लिए परिस्थितियां बिल्कुल अनुकूल हैं। हालांकि उन्होंने अमेरिका में भारत उत्पादों पर लगाये गये आयात शुल्क और भू-राजनैतिक कारकों के मद्देनजर नजदीकी नजर रखने की वकालत की। रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती की सर्वसम्मति से सिफारिश करते हुए समिति के छह में से पांच सदस्यों ने रुख तटस्थ बनाये रखने की वकालत की थी जबकि प्रो. राम सिंह ने रुख नरम करने का सुझाव दिया था।
श्री मल्होत्रा ने अपने बयान में कहा था कि साल के दौरान वैश्विक विकास मजबूत रहा है लेकिन भू-राजनैतिक और व्यापार चिंताओं, नीतिगत अनिश्चितताओं और आर्थिक बिखराव के कारण परिदृश्य पर दबाव है। कुछ विकसित देशों में मुद्रास्फीति में कमी के मद्देनजर उन्होंने आने वाले महीनों में अधिक नरम नीतिगत निर्णयों की उम्मीद जतायी और कहा कि प्रमुख केंद्रीय बैंकों के नीतिगत मामलों में अलग-अलग रुख अपनाने से वित्तीय बाजार में धारणा अनिश्चितता भरी है।
डॉ. पूनम गुप्ता ने कहा कि दूसरी तिमाही के जीडीपी के आंकड़ों से उत्साह के बाद आये तीसरी तिमाही के मासिक आंकड़ों से संकेत मिलते हैं कि दूसरी छमाही में वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से कम रह सकती है। उन्होंने कहा कि संभवतः वैश्विक अनिश्चितता का चरम स्तर पीछे छूट चुका है।
श्री इंद्रनील भट्टाचार्य ने कहा कि घरेलू स्तर पर जीएसटी सुधार और वित्तीय मोर्चों पर अनुकूल परिस्थितियां अर्थव्यवस्था को गति दे रही हैं, लेकिन व्यापार और आयात शुल्क संबंधी अनिश्चितताओं जैसे बाहरी कारक उसके लिए अवरोध पैदा कर रहे हैं।
प्रो. सिंह का तर्क था कि रेपो रेट घटाने में और देरी करने से जीडीपी वृद्धि की गति पर असर होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी आयात शुल्क और चीनी वस्तुओं से मिल रही प्रतिस्पर्धा से निर्यात को लेकर चुनौतियां जारी रहेंगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि रेपो दर घटाने से रुपये पर दबाव आयेगा, जो वास्तव में सच साबित हुआ। उन्होंने कहा था कि यह दबाव सीमित रहेगा।
श्री सौगत भट्टाचार्य ने कहा था कि विनिर्माण पीएमआई, वस्तुओं की बिक्री के आंकड़े दिखाते हैं कि व्यापार की परिस्थितियों को लेकर अनिश्चितता का असर दिखना शुरू हो गया है।
डॉ. नागेश कुमार ने कहा कि भू-राजनैतिक और व्यापार संबंधी अनिश्चितताओं ने कारोबारी धारणा पर प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। विशेषकर ट्रंप प्रशासन के आयात शुल्क का असर कपड़ा एवं वस्त्र, चमड़े की वस्तुओं, गहने जेवरात, और श्रृंप जैसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर दिख रहा है जो श्रम प्रधान क्षेत्र हैं। इन सेक्टरों में ज्यादातर छोटे और मझौले उद्योग हैं और देश के कुल विनिर्माण-रोजगार में उनकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है। इसलिए आयात शुल्क का असर सीधे रोजगार और छोटे तथा मझौले उद्यमों पर पड़ेगा। एमपीसी की बैठक 03 से 05 दिसंबर तक हुई थी। बैठक के बाद एमपीसी ने रेपो दरों में 0.25 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की थी। साथ ही उसने रुख तटस्थ बनाये रखने का फैसला किया था।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित