नयी दिल्ली , फरवरी 05 -- राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ शुरू की गई कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) को वापस ले लिया है।
न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि यह पूरी प्रक्रिया धोखाधड़ी, मिलीभगत और दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रभावित थी। दरअसल अपराध की कमाई को छिपाने के लिए कंपनी और पीएमएलए के तहत कार्रवाइयों से बचने के लिए कंपनी दिवाला प्रक्रिया का आड़ ले रही थी।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कहा कि उसके प्रयासों के कारण यह महत्वपूर्ण न्यायिक परिणाम सामने आया है। एक अधिकारी ने बताया, "एनसीएलटी ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी), 2016 की धारा 65 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि दिवाला ढांचे का दुरुपयोग अपराध की कमाई को वैध बनाने या धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्यवाही को विफल करने के लिए एक ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता है।"ईडी ने कोलकाता और यूपी पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी के आधार पर एल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ पीएमएलए जांच शुरू की थी। जांच में पता चला कि एल्केमिस्ट होल्डिंग्स लिमिटेड और एल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड ने ऊंचे रिटर्न या प्लॉट/विला/फ्लैट का वादा करके जनता से 1,840 करोड़ रुपये से अधिक एकत्र किए थे, लेकिन निवेशकों को न तो संपत्ति दी गई और न ही पैसा वापस किया गया। इस राशि को 'इंटर-कॉर्पोरेट डिपॉजिट' (आईसीडी) के रूप में एल्केमिस्ट लिमिटेड सहित अन्य समूह कंपनियों में भेज दिया गया था।
ईडी ने 2021 में एल्केमिस्ट लिमिटेड और अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था, साथ ही 2024 और 2025 में विशेष अदालत (पीएमएलए) के समक्ष पूरक आरोप पत्र भी दाखिल किए। निदेशालय ने सात अलग-अलग आदेशों के माध्यम से 492.72 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क भी किया है।
ईडी की जांच में पाया गया कि एल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करने के लिए 'साई टेक मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड' द्वारा आवेदन दिया गया था। इसके बाद बनी 'लेनदारों की समिति' (सीओसी) में लगभग पूरी तरह से एल्केमिस्ट समूह की संस्थाओं का दबदबा था, जिसमें टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड के पास लगभग 97 प्रतिशत वोटिंग अधिकार थे।
निदेशालय ने न्यायाधिकरण को साक्ष्य दिए कि सीओसी के प्रमुख सदस्य वही समूह संस्थाएं थीं जिन पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है तथा दिवाला प्रक्रिया का उपयोग कुर्क की गई संपत्तियों को वापस पाने और आईबीसी की धारा 32ए के तहत कानूनी सुरक्षा लेने के लिए एक उपकरण के रूप में किया जा रहा था। साथ ही, एल्केमिस्ट समूह के एक पूर्व कर्मचारी गौरव मिश्रा को 'रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल' नियुक्त किया गया था, जिससे इसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे। इसके एनसीएलटी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, ईडी को जानबूझकर समय पर पक्षकार नहीं बनाया गया, जो दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाता है।
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