शिमला , जनवरी 31 -- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पानी की बिगड़ती गुणवत्ता ,जलीय जीवन और नदी के स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ प्रमुख केंद्रीय एजेंसियों को यमुना नदी में प्रदूषण को रोकने के लिये निगरानी और प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करने का निर्देश दिया है।

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की अध्यक्षता वाली पीठ ने 16-पृष्ठ के विस्तृत आदेश में एक मूल आवेदन का निपटारा करते हुए राज्यों को 10 विशिष्ट निर्देश जारी किए। इसमें उनके संबंधित अधिकार क्षेत्र में अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे को बहाये जाने की जांच करने और अनुपचारित कचरे को नदी में प्रवेश करने से रोकने में केंद्रीय एजेंसियों की सहायता करने के उपायों की रूपरेखा तैयार की गयी है।

एनजीटी एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर शुरू किये गये स्वतः संज्ञान आवेदन पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें यमुना में देशी मछली प्रजातियों में भारी गिरावट और प्रदूषण-सहिष्णु विदेशी प्रजातियों में इसी तरह की वृद्धि पर प्रकाश डाला गया था।

एनजीटी ने कहा कि प्रदूषण, विशेष रूप से अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे से नदी के क्षरण के मुख्य कारणों में से एक बना हुआ है। एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का हवाला देते हुए पाया कि यमुना के किनारे कई निगरानी वाले स्थान घुलित ऑक्सीजन, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), पीएच और कुल कोलीफॉर्म के लिए निर्धारित जल गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे।

ये मानक जलीय जीवन और मत्स्य पालन के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण हैं। पीठ ने बताया कि दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर अनुपालन स्तर निर्धारित मानदंडों से काफी नीचे थे। एनजीटी ने सीपीसीबी, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) और दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिया कि शहरी स्थानीय निकायों और नदी के किनारे स्थित उद्योगों द्वारा अपशिष्ट निर्वहन मानकों को सख्ती से लागू किया जाए।

एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना में तेजी लाने और उनके प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया ताकि केवल निर्धारित मानकों को पूरा करने वाला उपचारित अपशिष्ट जल ही यमुना में छोड़ा जाए।

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