भुवनेश्वर , दिसंबर 30 -- उड़ीसा उच्च न्यायालय ने लिंग परिवर्तन सर्जरी करवाकर पुरुष बनने वाली महिला की मदद करते हुए राज्य सरकार को भूमि दाखिल-खारिज प्रमाण पत्र में याचिकाकर्ता का लिंग परिवर्तित करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति ए.सी. बेहरा की एकल पीठ ने अपने आदेश में भुवनेश्वर स्थित सामान्य प्रशासन विभाग सहित सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे 15 दिनों के अंदर याचिकाकर्ता का नाम दाखिल-खारिज प्रमाण पत्र में और उसकी स्थिति एवं लिंग को पोती से पोता में परिवर्तित करें।

न्यायमूर्ति बेहरा ने अपने आदेश में समान मुकदमे में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर लोगों के संरक्षा, सुरक्षा, विकास एवं संरक्षण से संबंधित कानून और याचिकाकर्ता जैसे लोगों के प्रति अदालतों के कर्तव्य को शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है।

उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने अपनी लैंगिक विशेषताओं एवं धारणाओं के अनुरूप अपना लिंग परिवर्तन कर लिया है और जब चिकित्सा नैतिकता द्वारा इसकी अनुमति है तथा कोई कानूनी रोक नहीं है, तो लिंग परिवर्तन के बाद लिंग पुनर्निर्धारण के आधार पर लैंगिक पहचान को उचित मान्यता देने में कानूनी या अन्य कोई बाधा नहीं है।

उचित जांच-पड़ताल के बाद कटक के जिला मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में एक प्रमाण पत्र जारी किया, जिसमें यह प्रमाणित किया गया कि याचिकाकर्ता का चिकित्सा उपचार किया गया है और याचिकाकर्ता ने अपना लिंग महिला से पुरुष में परिवर्तित कर लिया है, जिसके लिए वह सभी आधिकारिक दस्तावेजों में अपना नाम और लिंग बदलने का हकदार है।

याचिकाकर्ता ने दो नवंबर, 2023 को तमिलनाडु के राजपत्र में एक अधिसूचना प्रकाशित कर अपनी लिंग परिवर्तन की घोषणा की थी।

ओडिशा सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के संपदा निदेशक ने हालांकि बाद में दाखिल-खारिज प्रमाण पत्र में नाम और लिंग परिवर्तन के लिए दिए गए आवेदन को खारिज कर दिया।

संपदा निदेशक द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद, याचिकाकर्ता ने लिंग परिवर्तन सर्जरी, कटक के जिला मजिस्ट्रेट और अन्य सक्षम अधिकारियों द्वारा उसके पक्ष में जारी प्रमाण पत्र, पैन कार्ड, पहचान पत्र और आधार कार्ड के आधार पर उच्च न्यायालय का रुख किया।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित