जयपुर , दिसम्बर 20 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के 18 वर्ष पुराने मामले में तीन पुलिसकर्मियों को बरी करते हुए कहा है कि केवल ट्रैप करके रिश्वत के साथ रंगे-हाथ पकड़े जाने का तथ्य भ्रष्टाचार का दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
न्यायालय ने साफ कहा कि रिश्वत लेने के अपराध के लिए 'स्पष्ट मांग', 'बरामद रकम' और सम्बंधित काम का लंबित होना ये तीनों तत्वों का प्रमाण होना अनिवार्य है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में न्यायिक मानदंडों को दोहराते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दोष सिद्ध करने के लिए सिर्फ ट्रैप (जाल) में पैसे पकड़े जाने पर आधारित दलीलों से काम नहीं चलेगा। अदालत के अनुसार, मान लिया जाना चाहिए कि किसी सरकारी सेवक ने रिश्वत मांगी और स्वीकार की, तब ही भ्रष्टाचार का मामला स्थापित होता है और इस मांग को भी तथ्यों से स्पष्ट रूप से साबित किया जाना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कई निर्णयों में यह सिद्धांत स्पष्ट किया गया है कि धारा सात (रिश्वत लेना) के तहत अपराध सिद्ध होने के लिए रिश्वत की 'मांग' और 'स्वीकृति' का प्रमाण होना अनिवार्य शर्त है। केवल बरामदगी या ट्रैप संचालन से अपराध साबित नहीं माना जा सकता।
उल्लेखनीय है कि अदालत ने 18 वर्ष पुराना यह मामला इसी सिद्धांत के आधार पर खारिज किया और तीन पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से लंबित मामलों में भी प्रमाण की नैतिक और विधिक मजबूती आवश्यक है, न कि केवल तकनीकी साधनों पर आधारित साक्ष्य से मामला तय किया जाए।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल ट्रैप में पकड़ी गई रकम से भ्रष्टाचार साबित नहीं होगा। साथ ही रिश्वत की स्पष्ट मांग का प्रमाण आवश्यक है और रिश्वत लेने वाला अधिकारी या कर्मचारी संबंधित कार्य को करने के लंबित रहने का भी सबूत देना जरूरी है।
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