नयी दिल्ली , फरवरी 03 -- उच्चतम न्यायालय ने नोएडा हेट स्पीच मामले में पुलिस की निष्क्रियता का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका को एक मुस्लिम धर्मगुरु ने दायर किया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि हेट स्पीच मामले में स्थानीय पुलिस में बार-बार शिकायत करने के बावजूद उसने मामला दर्ज करने से इनकार किया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने घटना की निष्पक्ष एवं तटस्थ जांच की मांग करने वाली याचिका एवं शिकायत पर कार्रवाई करने में कथित रूप से विफल रहे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर भी विचार किया। शीर्ष अदालत ने हाल ही में हेट स्पीच से संबंधित याचिकाओं में अपना आदेश सुरक्षित रखा है लेकिन उसने इस मामले को लंबित रखने का निर्णय लिया क्योंकि इसमें अलग-अलग मुद्दे उठाए गए हैं।

इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि यह मामला पहले से चल रहा है इसलिए इसकी बहुत हद तक प्रासंगिकता नहीं है और याचिका में अब कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं बचा है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुज़ैफा अहमदी ने तर्क दिया कि मुख्य शिकायत जस की तस बनी हुई है क्योंकि पुलिस ने हेट स्पीच संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने से लगातार इनकार किया है।

श्री अहमदी ने चार जुलाई, 2021 की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य पुलिस निरंतर मामला दर्ज करने से इनकार करती रही और जनवरी 2023 में उच्चतम न्यायालय द्वारा केस डायरी मांगने के बाद ही एफआईआर दर्ज की।

उन्होंने कहा कि हालांकि एफआईआर में हेट स्पीच से संबंधित धाराओं का उल्लेख नहीं किया गया और इसे केवल मानवता के विरुद्ध अपराध माना गया। जब न्यायमूर्ति मेहता ने पूछा कि किन प्रावधानों का उल्लेख होना चाहिए था तो श्री अहमदी ने आईपीसी की धारा 153ए और 295ए का हवाला दिया।

न्यायमूर्ति मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह निचली अदालत पर निर्भर करेगा कि वह अपराधों पर विचार करे।

श्री अहमदी ने तर्क दिया कि यह मामला अधिकारियों द्वारा ऐसे अपराधों को स्वीकार करने या उन पर कार्रवाई करने की अनिच्छा का व्यापकता को दर्शाता है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि जिन मामलों में आदेश सुरक्षित रखे गए हैं उनमें पहले से ही हेट स्पीच से जुड़े कई बड़े मुद्दे विचाराधीन हैं। न्यायमूर्ति मेहता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 का भी उल्लेख किया कि कुछ अपराधों के लिए अभियोजन को बिना अधिकारिक अनुमोदन के नहीं बढ़ाया जा सकता है।

श्री अहमदी ने विरोध दर्ज करते हुए कहा कि इस चरण में किसी अनुमोदन का सवाल नहीं है और तर्क दिया कि हेट स्पीच के लिए एफआईआर दर्ज करने में बार-बार विफल रहना एक प्रणालीगत समस्या की ओर इशारा करता है जिसका राष्ट्रीय अखंडता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। पीठ ने मामले का सामान्यीकरण करने के खिलाफ चेतावनी दी क्योंकि अदालत एक विशेष घटना पर सुनवाई कर रही थी और उसके सामने मामले का दायरे बढ़ाने के लिए कोई सांख्यिकीय सामग्री उपलब्ध नहीं थी।

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