नयी दिल्ली , फरवरी 09 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की । इस बीच केंद्र सरकार ने न्यायालय को सूचित किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 के तहत उनकी हिरासत की समीक्षा में कोई प्रगति नहीं हुई है और उनकी स्वास्थ्य स्थिति 'बिल्कुल ठीक' हैन्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ सोमवार को डॉ. गीतांजलि आंग्मो की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उनके पति सोनम वांगचुक की हिरासत को अवैध घोषित करने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता के.एम. नटराज ने कहा कि श्री वांगचुक की स्थिति स्थिर है और एम्स जोधपुर में उनका सर्वोत्तम चिकित्सा उपचार किया जा रहा है, जो शायद उनके लद्दाख में रहने पर उपलब्ध नहीं हो पाता।
जब पीठ ने इस बारे में जानकारी मांगी कि क्या केंद्र सरकार ने श्री वांगचुक के स्वास्थ्य की चिंताओं को देखते हुए उनकी हिरासत की समीक्षा की है, तो श्री नटराज ने स्पष्ट रूप से उत्तर दिया, "नहीं, कुछ नहीं किया गया है।"न्यायालय इस जवाब से असंतुष्ट दिखा और न्यायमूर्ति वराले ने याद दिलाया कि पिछली बार पीठ ने सुझाव दिया था कि केंद्र सरकार श्री वांगचुक की हिरासत पर पुनर्विचार करे, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि वह पहले ही लगभग पांच महीने हिरासत में बिता चुके हैं।
गौरतलब है कि चार फरवरी को पीठ ने विशेष रूप से अतिरिक्त महाधिवक्ता से हिरासत की संभावित समीक्षा पर निर्देश लेने को कहा था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पहले एक आवेदन दायर कर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से वांगचुक की जांच कराने की मांग की थी। आवेदन में कहा गया था कि श्री वांगचुक के पेट में बार-बार दर्द हो रहा है और यह संभवतः दूषित पानी के कारण है। न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, वांगचुक की एम्स जोधपुर में जांच की गई और फिर न्यायालय में एक मेडिकल रिपोर्ट पेश की गई।
रिपोर्ट का हवाला देते हुए श्री नटराज ने दोहराया कि श्री वांगचुक का स्वास्थ्य 'बिल्कुल ठीक' है और उन्हें उचित उपचार मिल रहा है।
न्यायमूर्ति वराले ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि स्वास्थ्य समस्याओं के होने पर कोई विवाद नहीं है और उपचार केवल न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही दिया जा रहा है। जब अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि राजस्थान में उपचार की सुविधाएं लद्दाख की तुलना में बेहतर हैं, तो न्यायमूर्ति वराले ने जवाब दिया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के संदर्भ में ऐसा तर्क नहीं दिया जा सकता।
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