नयी दिल्ली , जनवरी 30 -- उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से शराब की दुकानों और विद्यालयों समेत संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों के बीच की न्यूनतम दूरी कम करने के फैसले पर जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि राज्य का यह कदम कानूनी दखल अंदाजी जैसा लगता है।
न्यायालय ने कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले के फैसले के आधार को हटाये बिना संबंधित नियमों में बदलाव कर उच्चतम न्यायालय के एक बाध्यकारी फैसले के असर को कम करने की कोशिश की है।
पीठ ने कहा, " हमारा मानना है कि उत्तर प्रदेश राज्य ने न्यायालय के फैसले का उल्लंघन किया है और उच्च न्यायालय ने इसके उलट फैसला सुनाकर गलती की है। इस न्यायालय के एक बाध्यकारी फैसले को नियम बनाने वाला प्राधिकरण उसके आधार को हटाये बिना बेअसर करने की कोशिश कर रहा है।"इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर पूछा कि जिस तरह उत्तर प्रदेश शराब की दुकानों की संख्या और स्थान नियम, 1968 के नियम 5(4) को बदला गया है, इसे कानूनी दखल मानकर क्यों न रद्द कर दिया जाए?शीर्ष अदालत ने उप्र सरकार को सात दिनों के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
न्यायालय ने कहा, "चूंकि यह मामला गंभीर सार्वजनिक हित से जुड़ा है, इसलिए हम उत्तर प्रदेश राज्य को खुद से नोटिस जारी कर कारण बताने के लिए कह रहे हैं।"यह आदेश उत्तर प्रदेश राज्य की नागरिक अपील में पास किया गया था। इसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो फरवरी 2010 के फैसले को चुनौती दी गयी थी। फैसले ने इस अधिनियम के 2008 के बदले गये 1968 के नियमों के नियम 5(4) को रद्द कर दिया था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हालांकि संशोधन को अमान्य कर दिया है, लेकिन उसने माना है कि यह संशोधन उच्चतम न्यायालय के पहले के फैसले की अवमानना नहीं है, जिसमें कम से कम दूरी अधिक तय की गयी थी।
इस बात से असहमति जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह किसी गैर-कानूनी काम को जारी रहने की इजाजत नहीं दे सकता, भले ही प्रतिवादी संस्था के हित सुरक्षित हों। यह मामला उच्चतम न्यायालय के 2008 के एक निर्णय से जुड़ा है, जो 'उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम मनोज कुमार द्विवेदी और अन्य' के वाद में दिया गया था। इस निर्णय में 1968 के नियमों के नियम 5(4) की व्याख्या की गयी थी।
यह प्रावधान सार्वजनिक आश्रय स्थलों, विद्यालयों, अस्पतालों, पूजा स्थलों, कारखानों, बाजारों और आवासीय कॉलोनियों के 'निकटतम क्षेत्र' में शराब की दुकानों को लाइसेंस देने पर रोक लगाता है।
उस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ऐसी जगहों से शराब की दुकानों के लिए कम से कम 100 मीटर (लगभग 300 फीट) की दूरी तय की थी।
उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए इस मानक को सही ठहराया कि 'करीब' शब्द स्पष्ट नहीं है और इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है, जबकि एक निश्चित दूरी तय करने से यह संदेह दूर हो जाता है।
न्यायाय ने हालांकि प्रभावित पार्टियों को नोटिस दिये बिना दुकानें बंद करने को गलत बताया, लेकिन उसने नियम का सही मतलब बताते हुए 100 मीटर या 300 फीट की दूरी को साफ तौर पर सही ठहराया।
इस मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि इस बाध्यकारी व्याख्या के बावजूद राज्य ने बाद में नियम 5(4) में बदलाव कर नगर निगम क्षेत्र में कम से कम दूरी को 50 मीटर और नगर पालिका तथा नगर पंचायत क्षेत्र में 75 मीटर कर दिया।
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