नयी दिल्ली , फरवरी 06 -- उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को तमिलनाडु कैडर के 2004 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने उसी चयन वर्ष के लिए राजस्थान कैडर में एक आंतरिक रिक्ति के आवंटन की मांग की थी। अदालत ने कहा कि इस तरह के विलंबित दावों पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि वे कैडर आवंटन की व्यवस्था को अस्थिर कर देंगे।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता रूपेश कुमार मीणा ने 2004 के चयन के छह साल बाद केवल 2010 में अपना दावा पेश किया था और दो दशकों से अधिक समय के बाद याचिका पर विचार करने से कैडर आवंटन प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए अव्यवस्थित हो जाएगी।

शीर्ष अदालत ने कहा, "हमारी राय में ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती। इससे कैडर आवंटन या परिवर्तन की प्रक्रिया हमेशा के लिए अव्यवस्थित बनी रहेगी। चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।" साथ ही यह भी कहा कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि 2004 बैच के लिए राजस्थान की आंतरिक भर्ती का पद 20 वर्षों से अधिक समय से खाली पड़ा है।

न्यायालय ने माना कि ऋषीकेश मीणा ने 2004 की परीक्षा में आईपीएस के लिए अर्हता प्राप्त की थी, लेकिन उन्होंने 2004 बैच में सेवा नहीं की क्योंकि वे पहले से ही 2003 बैच के आईपीएस अधिकारी थे। उन्होंने राजस्थान में उन्हें दी गई आंतरिक रिक्ति को भी अस्वीकार कर दिया। मेरिट सूची में अगले उम्मीदवार राजेश कुमार ने राजस्थान की आंतरिक रिक्ति के लिए आवेदन किया और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) द्वारा उन्हें राहत प्रदान की गई।

भारत सरकार ने कैट के आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। रिट याचिका लंबित रहने के दौरान, राजेश कुमार का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में हो गया और उन्होंने आईएएस में कार्यभार ग्रहण कर लिया, जिससे आईपीएस में आंतरिक रिक्ति के लिए उनका दावा निष्फल हो गया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 14 सितंबर, 2010 को रिट याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण के आदेश को मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा और कानून के प्रश्न को खुला छोड़ दिया।

राजस्थान कैडर में भर्ती के लिए योग्यता सूची में तीसरे स्थान पर रहे रूपेश कुमार मीणा ने इसके बाद अपना दावा पेश करते हुए तर्क दिया कि चूंकि उनसे वरिष्ठ दोनों उम्मीदवारों ने 2004 बैच की आंतरिक भर्ती के अंतर्गत कार्यभार नहीं संभाला इसलिए वे राजस्थान कैडर में आवंटन के हकदार थे। कैट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, इस फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा जिसमें उनकी पुनर्विचार याचिका को खारिज करना भी शामिल था।

उच्चतम न्यायालय के समक्ष श्री मीणा ने तर्क दिया कि वे कैडर परिवर्तन नहीं बल्कि केवल संशोधन की मांग कर रहे थे और दावा किया कि उनके वरिष्ठ द्वारा मना किए जाने के बाद राजस्थान में रिक्त पद पर उनका कानूनी अधिकार है। उन्होंने आगे कहा कि उनकी ओर से कोई देरी नहीं हुई क्योंकि स्थिति 2010 में ही स्पष्ट हुई थी।

भारत सरकार ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि एक बार किसी उम्मीदवार को कैडर आवंटित हो जाने पर, जिसमें आंतरिक रिक्ति भी शामिल है, वह रिक्ति भर जाती है। सरकार ने आगे तर्क दिया कि वर्षों बाद ऐसे दावों को स्वीकार करने से स्थापित कैडर आवंटन प्रणाली बाधित होगी और इसी तरह के दावों की एक श्रृंखला शुरू हो जाएगी।

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