नयी दिल्ली , मार्च 09 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उस जनहित याचिका को सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें आयकर विभाग की छापेमारी की शक्तियों को चुनौती दी गयी थी।

याचिकाकर्ता ने आयकर अधिनियम के उन नियमों पर सवाल उठाये थे, जो टैक्स चोरी की जांच के दौरान बिना किसी पूर्व सूचना के तलाशी, जब्ती और डिजिटल डेटा (जैसे मोबाइल, ईमेल, क्लाउड स्टोरेज) खंगालने की अनुमति देते हैं।

इस याचिका में आयकर अधिनियम 1961 के मौजूदा नियमों और एक अप्रैल से लागू होने वाले आयकर अधिनियम 2025 के नये ढांचे पर आपत्ति जतायी गयी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि अधिकारियों को मिली ये व्यापक शक्तियां करदाताओं के उत्पीड़न और निजता के उल्लंघन का कारण बन सकती हैं।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस पर अहम टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि अदालत सिर्फ इस डर से किसी नियम की वैधता की जांच नहीं कर सकती कि उसका भविष्य में दुरुपयोग हो सकता है। अदालत ने साफ किया कि ये प्रावधान बड़े पैमाने पर होने वाली टैक्स चोरी को रोकने के लिए बनाये गये हैं।

अदालत का कड़ा रुख देखते हुए याचिकाकर्ता ने अर्जी वापस ले ली। अब वह इन विवादित नियमों पर स्पष्टीकरण के लिए केंद्र सरकार का दरवाजा खटखटायेंगे। अदालत ने उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी है।

याचिका में तलाशी और जब्ती की उन शक्तियों से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गयी थी, जो आयकर अधिकारियों को छापेमारी के दौरान परिसरों का मुआयना करने और मोबाइल फोन, ईमेल, कंप्यूटर तथा क्लाउड डेटा जैसे डिजिटल रिकॉर्ड खंगालने की अनुमति देते हैं। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि ये शक्तियां बहुत ज्यादा व्यापक हैं और इनमें दुरुपयोग रोकने के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों की कमी है।

याचिका में इस बात पर भी चिंता जतायी गयी थी कि आयकर अधिकारियों के लिए ऐसी तलाशी शुरू करने के कारणों का खुलासा करना अनिवार्य नहीं है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह व्यवस्था निजता का अधिकार कमजोर कर सकती है और अधिकारियों को मनमानी कार्रवाई करने का मौका दे सकती है।

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि अदालत इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करे। इसके विकल्प के रूप में उन्होंने यह मांग भी रखी कि अदालत इन नियमों की ऐसी व्याख्या करे, जो संविधान के तहत मिलने वाली समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी के साथ मेल खाती हो।

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