नयी दिल्ली , फरवरी 04 -- उच्चतम न्यायालय ने अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) की कंपनियों से जुड़े 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले की जांच में "अकारण देरी" को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को कड़ी फटकार लगाई है।

इसके साथ ही कई बैंकों की शिकायतों के बावजूद केवल एक ही एफआईआर दर्ज करने पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की भी आलोचना की है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि वर्ष 2025 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की शिकायत पर दर्ज एकमात्र एफआईआर के दायरे को अन्य बैंकों की बाद की शिकायतों तक बढ़ाना "प्रक्रियात्मक कानून के अनुरूप प्रतीत नहीं होता।"न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग बैंकों की शिकायतें अलग लेन-देन से जुड़ी हैं और इसलिए प्रत्येक के लिए अलग एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। पीठ ने सीबीआई को इस पहलू की समीक्षा करने और कथित धोखाधड़ी में बैंक अधिकारियों की संभावित मिलीभगत की भी जांच करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने कहा, "ईडी और सीबीआई दोनों पहले ही समय ले चुके हैं, इसलिए हम अपेक्षा करते हैं कि दोनों एजेंसियां अब त्वरित कार्रवाई करें।" पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि ईडी वरिष्ठ अधिकारियों की विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित कर कानूनी दायरे में रहते हुए जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाए।

यह टिप्पणियां पूर्व केंद्रीय सचिव ईएएस सरमा द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की गईं, जिसमें एडीएजी कंपनियों द्वारा सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर कथित दुरुपयोग और धन-निकासी की अदालत-निगरानी में जांच की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से एडीएजी के चेयरमैन अनिल अंबानी को देश छोड़ने से रोकने का आग्रह किया और बड़े आर्थिक अपराधियों के विदेश भागने के पुराने मामलों का हवाला दिया।

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को बताया कि अनिल अंबानी के खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर जारी किए जा चुके हैं और केंद्र सरकार न्यायालय द्वारा पारित किसी भी निषेधाज्ञा का स्वागत करेगी। इस पर अनिल अंबानी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आश्वासन दिया कि अंबानी अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे।

पीठ ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड में लेते हुए सॉलिसिटर जनरल के उस बयान को भी दर्ज किया कि जांच में कोई बाधा न आए, इसके लिए सभी निवारक और सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। प्रारंभ में सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को बताया कि एडीएजी कंपनियों द्वारा कथित तौर पर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की राशि बैंक ऋण धोखाधड़ी के जरिए निकाली गई है।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि ईडी और सीबीआई ने जांच की स्थिति पर अलग-अलग स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की हैं। जब सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि एफआईआर एसबीआई की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी, तो मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि अन्य बैंकों की शिकायतों पर अलग एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गईं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस पहलू की जांच की जाएगी।

प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सबसे पहले 2020 में बैंक ऑफ बड़ौदा से गबन की रिपोर्ट आई थी, लेकिन एसबीआई की शिकायत के बाद एफआईआर 2025 में ही दर्ज की गई। उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले में पहली गिरफ्तारी पिछले सप्ताह ही हुई, जब उच्चतम न्यायालय ने नोटिस जारी किया और ईडी ने रिलायंस कम्युनिकेशंस के पूर्व निदेशक पुनीत गर्ग को गिरफ्तार किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने धन की निकासी के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वास्तविक ऋण चूक को आपराधिक मामला नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अभियोजन की बजाय सरकार बकाया राशि तय करने के लिए एक समिति गठित कर सकती है।

एडीएजी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि रिलायंस पावर लिमिटेड और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने लगभग 20 हजार करोड़ रुपये चुका दिए हैं। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि यह जांच का विषय है कि कहीं कुछ भुगतान अन्य समूह कंपनियों से उधार लिए गए धन से तो नहीं किये गये हैं।

इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) का "धड़ल्ले से दुरुपयोग" हो रहा है। अपने हलफनामे में ईडी ने बताया कि उसने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड, रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड, रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड और रिलायंस पावर लिमिटेड से जुड़े तीन ईसीआईआर दर्ज किए हैं।

इसके अलावा, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत तीन और मामलों की जांच जारी है। एजेंसी ने बताया कि अब तक 13 अस्थायी कुर्की आदेश जारी किए गए हैं, जिनमें लगभग 12,012 करोड़ रुपये मूल्य की 204 संपत्तियां शामिल हैं। ईडी ने अपनी कार्रवाई में 46 तलाशी अभियान , 305 समन जारी करने , 213 बयान दर्ज करने, चार गिरफ्तारियां , दो अभियोजन शिकायतें और 14 लुकआउट सर्कुलर जारी किये हैं।

रिलायंस कम्युनिकेशंस मामले में ईडी का आरोप है कि भारतीय और विदेशी ऋणदाताओं से 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक के ऋण लिए गए, जिनमें से अपराध की आय 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। इस मामले में 8,078 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क की गई हैं।

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