नयी दिल्ली , फरवरी 01 -- कांग्रेस ने कहा है कि आम बजट 2026-27 में आर्थिक चुनौतियों से निपटने की ठोस पहल नहीं की गयी है और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक सर्वेक्षण में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा पेश चुनौतियों को जिस तरह से नजरअंदाज किया है उससे लगता है कि शायद उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण को पढ़ा ही नहीं है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने रविवार को यहां पार्टी मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि हर बजट की तरह इस बार के बजट पर भी सभी टिप्पणीकारों, लेखकों तथा अर्थशास्त्र के हर छात्र की पैनी नजर रही होगी और उन्होंने अवश्य संसद में वित्त मंत्री के भाषण को सुना होगा लेकिन उन्हें लगता है कि जो कुछ उन्होंने वित्त मंत्री के भाषण में सुना, उससे अवश्य ही स्तब्ध रह गये होंगे।

श्री चिदम्बरम ने कहा "मैं मानता हूँ कि बजट केवल वार्षिक राजस्व और व्यय का बयान भर नहीं होता। मौजूदा परिस्थितियों में बजट भाषण को उन प्रमुख चुनौतियों पर एक स्पष्ट दृष्टिकोण पेश करना चाहिए, जिनका ज़िक्र कुछ दिन पहले जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में किया गया था। मुझे संदेह है कि सरकार और वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण पढ़ा भी है या नहीं। अगर उन्होंने पढ़ा है, तो ऐसा लगता है कि उसे पूरी तरह से दरकिनार करने का फैसला किया गया। मैं कम से कम 10 ऐसी चुनौतियाँ गिना सकता हूँ, जिन्हें आर्थिक सर्वेक्षण और कई जानकार विशेषज्ञों ने चिन्हित किया है।"कांग्रेस नेता ने कहा कि आर्थिक विषयों के विभिन्न विशेषज्ञों ने जिन दस क्षेत्रों की चुनौतियों को प्रमुखता से उठाया है उनके समाधान के लिए कोई प्रयास बजट में नहीं हुआ है। उनका कहना था कि इसमें बड़ा मुद्दा अमेरिकी दंडात्मक आयात शुल्क है जिन्होंने निर्माताओं, विशेष रूप से निर्यातकों, के लिए दबाव पैदा किया है। इसी तरह की अन्य चुनौतियों में लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक संघर्ष, जो निवेश पर बोझ डालने, बढ़ता हुआ व्यापार घाटा, विशेष रूप से चीन के साथ, सकल स्थिर पूंजी निर्माण है जिसमें लगभग 30 प्रतिशत) का कम स्तर और निजी क्षेत्र की निवेश करने में हिचकिचाहट है।

उन्होंने कहा कि देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवाह को लेकर अनिश्चित दृष्टिकोण और पिछले कई महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश( एफपीआई) का लगातार बाहर जा रहा है। राजकोषीय समेकन की बेहद धीमी गति और एफआरबीएम के विपरीत लगातार ऊँचा राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा है जबकि आधिकारिक रूप से घोषित मुद्रास्फीति के आँकड़ों और घरेलू खर्च, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के वास्तविक बिलों के बीच लगातार बना रहने वाला अंतर, लाखों एमएसएमई का बंद होना और बचे हुए एमएसएमई का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करने के साथ ही रोज़गार की अस्थिर स्थिति, विशेष रूप से युवाओं में बेरोज़गारी तथा बढ़ता शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों (नगरपालिकाओं और नगर निगमों) में बिगड़ता बुनियादी ढांचा के साथ ही इनमें से किसी भी मुद्दे को वित्त मंत्री के भाषण में संबोधित नहीं किया गया। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि तालियाँ औपचारिक-सी थीं और अधिकांश श्रोता बहुत जल्दी ध्यान हटाकर अलग हो गए। यहाँ तक कि संसद टीवी द्वारा किया गया प्रसारण भी कई बार बंद हो गया।

उन्होंने आरोप लगाया कि 2025-26 में सरकार का वित्तीय प्रबंधन बेहद कमजोर रहा। राजस्व प्राप्तियों और कुल व्यय में बड़ी कमी दर्ज की गई, जबकि पूंजीगत व्यय में भी कटौती की गई। श्री चिदंबरम के अनुसार ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सामाजिक कल्याण जैसे आम जनता से जुड़े क्षेत्रों में भारी कटौती की गई है।

कांग्रेस नेता ने जल जीवन मिशन के बजट में तेज कटौती को "निर्मम" बताते हुए सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया । उन्होंने कहा कि राजकोषीय घाटे में मामूली कमी का लक्ष्य कोई साहसिक वित्तीय सुधार नहीं है। बजट में योजनाओं की भरमार है, लेकिन उनमें से कितनी टिकेंगी, यह संदेह का विषय है। उनका निष्कर्ष था कि यह बजट देश की आर्थिक चुनौतियों का समाधान देने में विफल रहा है।

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