पंचकूला , मार्च 07 -- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यहां आयोजित एक कार्यक्रम में महिलाओं के आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला गया।
इस वर्ष की वैश्विक थीम 'राइट्स, जस्टिस, एक्शन-फॉर ऑल वूमेन एंड गर्ल्स' महिलाओं और बालिकाओं के अधिकार, समानता और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने का संदेश देती है। आयुर्वेद में महिलाओं को परिवार की 'पहली डॉक्टर' माना जाता है। घर की रसोई में उपलब्ध जड़ी-बूटियों के माध्यम से परिवार के स्वास्थ्य की देखभाल करना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी दादी-नानी के घरेलू नुस्खे आयुर्वेदिक ज्ञान का स्पष्ट उदाहरण हैं।
सर्दी-जुकाम में तुलसी और अदरक का काढ़ा, पेट दर्द में अजवाइन का उपयोग तथा त्वचा की देखभाल के लिए हल्दी और चंदन का इस्तेमाल जैसे उपाय आयुर्वेदिक परंपरा के उदाहरण हैं, जिन्हें महिलाओं ने पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा है।
आयुर्वेद में महिला स्वास्थ्य को विशेष महत्व दिया गया है और गर्भावस्था, प्रसव देखभाल एवं मानसिक संतुलन से जुड़े कई विषयों पर विस्तृत वर्णन मिलताहै। संतुलित आहार, योग, ध्यान और प्राकृतिक औषधियां महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक मानी गयी हैं।
आज महिला आयुर्वेदाचार्य पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक चिकित्सा समझ के साथ जोड़कर नये स्वास्थ्य समाधान विकसित कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर परभी महिला विशेषज्ञ आयुर्वेद के सिद्धांतों और उपचार पद्धतियों को दुनिया तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार आयुर्वेद महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकार, पोषण, मानसिक संतुलन और बेहतर जीवनशैली के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। 'स्वस्थ नारी-सशक्त समाज' की भावना के साथ महिला दिवस पर महिलाओं के स्वास्थ्य और सम्मान को प्राथमिकता देने का संदेश दिया गया।
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