भावनगर , जनवरी 15 -- गुजरात में भावनगर जिले के पालिताणा तहसील के हणोल गांव में 'आत्मनिर्भर हणोल महोत्सव' के अंतर्गत गुरुवार को राज्यपाल आचार्य देवव्रत की अध्यक्षता में 'प्राकृतिक कृषि परिसंवाद' का आयोजन किया गया।
इस मौके पर श्री देवव्रत ने प्राकृतिक कृषि पर मार्गदर्शन देते हुए कहा कि रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से बचने के लिए प्राकृतिक कृषि अपनाना आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है। प्राकृतिक खेती से उत्पादन कम होता है, यह धारणा पूरी तरह गलत है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि हरियाणा के गुरुकुल कुरुक्षेत्र में उनके द्वारा 200 एकड़ भूमि पर पिछले नौ वर्षों से बिना यूरिया, डीएपी अथवा कीटनाशक दवाओं के प्राकृतिक खेती हो रही है और अन्य की तुलना में अधिक उत्पादन प्राप्त हो रहा है।
उन्होंने कहा कि ऑर्गेनिक खेती और प्राकृतिक खेती के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। ऑर्गेनिक खेती में उत्पादन और खर्च में विशेष अंतर नहीं आता, जबकि प्राकृतिक खेती में उत्पादन बढ़ता है और खर्च में उल्लेखनीय कमी आती है। प्राकृतिक खेती देशी गाय आधारित खेती है तथा इसमें बाहर से किसी भी सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती।
राज्यपाल ने प्राकृतिक खेती के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जंगलों के वृक्षों को किसी भी प्रकार का रासायनिक खाद या कीटनाशक दिए बिना भी पर्याप्त पोषण मिलता है। प्राकृतिक खेती में जीवामृत और घन जीवामृत के उपयोग से भूमि अधिक उपजाऊ बनती है और किसान का खर्च शून्य के निकट पहुंच जाता है।
यूनेस्को की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि समय रहते रासायनिक खादों का उपयोग कम नहीं किया गया तो आने वाले समय में भूमि बंजर हो जाएगी। हरित क्रांति के जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने भी रासायनिक खेती पर अत्यधिक निर्भर न रहने की चेतावनी दी थी। उन्होंने प्रति हेक्टेयर भूमि में केवल 13 किलोग्राम नाइट्रोजन डालने की सिफारिश की थी, जबकि आज यूरिया और डीएपी के अत्यधिक उपयोग से भूमि और जल प्रदूषित हो रहे हैं तथा कैंसर जैसे रोगों का प्रमाण भी बढ़ रहा है।
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