चंडीगढ़ , अप्रैल 02 -- भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू मान) ने गुरूवार को गेहूं खरीद सीजन की शुरुआत में आढ़तियों की हड़ताल की कड़ी निंदा की है।
भारतीय किसान यूनियन (मान) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद भूपिंदर सिंह मान के नेतृत्व में, सुखदेव सिंह झुनैर (उपाध्यक्ष), सुखविंदर सिंह काहलों (अध्यक्ष, बीकेयू जिला गुरदासपुर), बलराज सिंह रंधावा (महासचिव, बीकेयू मान जिला गुरदासपुर) और बलवंत सिंह नाडियाली (अध्यक्ष, बीकेयू मोहाली) ने कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न बन गया है कि हर साल गेहूं और धान की खरीद के महत्वपूर्ण समय पर, आढ़तिये सेवा प्रदाता होने के बजाय गुटबंदी के जरिए दबाव की रणनीति अपनाते हैं। ऐसे कदम, जो उस समय उठाए जाते हैं जब किसान अपनी उपज मंडियों में लाते हैं, आर्थिक ब्लैकमेल के समान हैं और पूरी खरीद प्रणाली को बाधित करते हैं।
आढ़तिये वर्तमान निश्चित दर के बजाय एमएसपी आधारित खरीद पर पुराने 2.5 प्रतिशत कमीशन को बहाल करने की मांग कर रहे हैं और 'साइलो' के माध्यम से होने वाली अनाज खरीद पर कम किए गए कमीशन का विरोध कर रहे हैं। इस संबंध में यह ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार ने पहले ही कमीशन 50.75 रूपये प्रति क्विंटल तय कर दिया है, जो उनके परिचालन खर्चों को पूरा करने के लिए एक उचित और तर्कसंगत राशि है। इसलिए, इन मांगों के आधार पर किसानों और खरीद कार्यों को बंधक बनाना कतई जायज नहीं है।
यूनियन ने याद दिलाया कि पिछले धान खरीद सीजन के दौरान, मंडियों में अनाज के रंग बदलने और नमी के बहाने किसानों से मनमानी कटौती और बड़े पैमाने पर लूट की व्यापक शिकायतें सामने आई थीं। ऐसी प्रथाओं ने किसानों के भरोसे को खत्म कर दिया है और आढ़तियों के आचरण को उजागर कर दिया है।
बीकेयू (मान) का कहना है कि खुद को किसानों का शुभचिंतक बताने वाले इन लोगों का व्यवहार एक अलग ही कहानी बयां करता है। जिस समय किसान सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करता है, उस समय मंडियों को छोड़ना और कामकाज रोकना पूरी तरह से अनुचित है।
यूनियन ने मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा लिए गए कड़े स्टैंड की सराहना की है, जिसमें उन्होंने शासन और खरीद प्रक्रिया को पटरी से उतारने वाली इन दबावपूर्ण नीतियों के आगे झुकने से इनकार कर दिया है। सरकारों को इस तरह के ब्लैकमेल के सामने नहीं झुकना चाहिए। यूनियन ने आढ़तियों से आह्वान किया है कि वे तुरंत अपनी हड़ताल वापस लें और किसानों की आजीविका को खतरे में डाले बिना रचनात्मक रूप से सहयोग करें।
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