रांची , फरवरी 03 -- झारखंड में "जलवायु-अनुकूल किस्म विकास के लिए ट्रांसलेशनल जीनोमिक्स" विषय पर 21 दिवसीय शीतकालीन विद्यालय का उद्घाटन आज आईसीएआर-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, रांची में किया गया।
यह शीतकालीन विद्यालय 3 से 23 फरवरी, 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। उद्घाटन कार्यक्रम में प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल, कुलपति, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ, रांची, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस शीतकालीन विद्यालय में देशभर के आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा यूजीसी-मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों से 20 वैज्ञानिक, सहायक प्राध्यापक एवं संकाय सदस्य भाग ले रहे हैं।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों की ओमिक्स तकनीकों तथा विशाल जीनोमिक डेटाबेस संसाधनों के उपयोग से सटीक और जलवायु-अनुकूल फसल सुधार के लिए उनकी समझ और व्यावहारिक कौशल को सुदृढ़ करना है।
पाठ्यक्रम में संरचनात्मक, कार्यात्मक एवं ट्रांसलेशनल जीनोमिक्स, जीनोमिक्स-सहायित प्रजनन अनुप्रयोग, सीक्वेंसिंग एवं जीनोम असेंबली उपकरण, संरचनात्मक बायोइन्फॉर्मेटिक्स, आणविक मार्कर एवं गुण (ट्रेट) खोज, मल्टी-ओमिक्स डेटा का एकीकरण, सिस्टम्स बायोलॉजी दृष्टिकोण तथा आधुनिक प्रजनन कार्यक्रमों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के साथ उन्नत संगणनात्मक उपकरणों के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों को व्यापक रूप से शामिल किया गया है।
अपने संबोधन में डॉ. सुजय रक्षित, निदेशक, आईसीएआर-आईआईएबी, रांची ने राष्ट्र के विकास और आर्थिक प्रगति में कृषि तथा कृषि वैज्ञानिकों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उन्होंने स्वतंत्रता के समय भारत की खाद्य अभाव और निर्भरता की स्थिति से लेकर आज किसानों, वैज्ञानिक अनुसंधान और आईसीएआर जैसी संस्थागत सहायता प्रणालियों के सतत प्रयासों के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में प्राप्त आत्मनिर्भरता और मजबूती की यात्रा पर प्रकाश डाला।
डॉ. रक्षित ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान पीढ़ी के वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की सीमाएँ और बढ़ती खाद्य आवश्यकताओं जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए सक्षम बनाना आवश्यक है, ताकि वे राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान दे सकें और विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण को साकार करने में सहयोगी बनें। इस अवसर पर प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल ने नीति निर्माण से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि देश में नीति निर्धारण की प्रक्रिया में कृषि, किसान और संबंधित संस्थान सदैव केंद्रीय भूमिका निभाते हैं तथा अधिकांश राष्ट्रीय नीतियाँ कृषि की सततता और किसानों के कल्याण को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं।
डॉ. रक्षित ने देश के कृषि अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को दिशा देने और सुदृढ़ करने में आईसीएआर की अग्रणी भूमिका की सराहना की। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. वी. पी. भदाना के औपचारिक स्वागत भाषण से हुई, जबकि डॉ. के. आर. सोरेन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उद्घाटन कार्यक्रम में आईसीएआर-आईआईएबी के संकाय सदस्य एवं कर्मचारी भी उपस्थित रहे।
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