नयी दिल्ली , अप्रैल 23 -- इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग ने विश्व धरोहर दिवस तथा विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस के अवसर पर एक संगोष्ठी आयोजित की जिसमें भारतीय पाण्डुलिपि परम्परा, ज्ञान-सम्पदा और उसकी समकालीन उपयोगिता पर गंभीर मंथन एवं विमर्श हुआ।

केन्द्र की विज्ञप्ति के अनुसार "इंडियन मैन्यूस्क्रिप्ट्स : नॉलेज सिस्टम्स, कल्चरल मेमोरी एंड कंटेम्परेरी रेलेवेंस" (भारतीय पाण्डुलिपियां : ज्ञान प्रणालियां, सांस्कृतिक स्मृति और समकालीन प्रासंगिकता) विषय पर आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों एवं विद्वानों ने अपने-अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी थे। संगोष्ठी की अध्यक्षता कला निधि प्रभाग के अध्यक्ष एवं डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौर ने की, जबकि संयोजन कला निधि प्रभाग के पाण्डुलिपि इकाई के प्रभारी डॉ. सरवारुल हक़ ने किया।

वक्ताओं ने कहा कि भारतीय पाण्डुलिपियां केवल प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति, दार्शनिक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक अनुभवों की जीवंत धरोहर हैं। इनका संरक्षण, अध्ययन और पुनर्पाठ वर्तमान समय की बौद्धिक आवश्यकता है।

संगोष्ठी को चार प्रमुख सत्रों में विभाजित किया गया। प्रथम सत्र 'वेद, वेदांग और दार्शनिक परम्परा' में वेद, वेदांग और भारतीय दार्शनिक परम्पराओं की ज्ञान-व्यवस्था पर विचार हुआ। द्वितीय सत्र 'कला, भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक परम्पराएं' में भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की निरंतरता एवं प्रासंगिकता पर विमर्श किया गया।

तृतीय सत्र 'पुराण, इतिहास और ऐतिहासिक आख्यान' में पुराणों, इतिहास-लेखन और भारतीय ऐतिहासिक आख्यानों की परम्परा को समझने का प्रयास किया गया। चतुर्थ सत्र 'विज्ञान, योग और आयुर्वेद' में भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि, योग परम्परा तथा आयुर्वेद की आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता पर विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किये।

विभिन्न सत्रों में देश के प्रतिष्ठित विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने सहभागिता की। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय पाण्डुलिपियों में निहित ज्ञान आज के वैश्विक विमर्श, जैसे - सतत विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, दर्शन और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संगोष्ठी ने परम्परा और आधुनिकता के बीच एक सशक्त संवाद स्थापित किया। वेदों से लेकर विज्ञान, योग और आयुर्वेद तक, विभिन्न सत्रों में भारतीय ज्ञान परम्परा की गहराई तथा उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर सारगर्भित विचार सामने आये। यह आयोजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर को समझने का माध्यम बना। आईजीएनसीए ने इस अवसर पर भारतीय पाण्डुलिपि धरोहर के संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक प्रसार के अपने संकल्प को पुनः दोहराया।

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