शिमला/मंडी , दिसंबर 17 -- हिमाचल प्रदेश में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा वित्तपोषित भूकंप पूर्वानुमान परियोजना लांच की है।

इसरो द्वारा वित्तपोषित इस तीन वर्षीय परियोजना का मकसद छह और उससे ज़्यादा तीव्रता वाले भूकंपों के लिए समय-स्वतंत्र पूर्वानुमान मॉडल विकसित करना है। शुरुआत में मंडी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए बाद में इस परियोजना को पूरे हिमालय में उन क्षेत्रों की पहचान करने के लिए लागू किया जाएगा जहां भूकंपीय घटनाओं की आशंका ज़्यादा है।

तीन वर्षीय यह परियोजना आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ़ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में की जा रही है, और इसका नेतृत्व महेश रेड्डी कर रहे हैं, जिसमें डेरिक्स पी. शुक्ला और धन्या जे. सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में काम कर रहे हैं। इसकी एक खास बात पारंपरिक भूकंपीय रिकॉर्ड का एडवांस्ड सैटेलाइट-आधारित टेक्नोलॉजी के साथ इंटीग्रेटेड इस्तेमाल है।

वैश्विक नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (जीएनएसएस) डेटा मिलीमीटर-स्तर की सटीकता के साथ टेक्टोनिक प्लेट की गतिविधियों को ट्रैक करेगा, जबकि इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार बड़े क्षेत्रों में फॉल्ट ज़ोन के साथ भूमि विरूपण, उत्थान, धंसाव और तनाव संचय का पता लगाएगा। एक साथ मिलकर ये उपकरण वैज्ञानिकों को धीमे भू-गतिकीय परिवर्तनों का पता लगाने में सक्षम बनाएंगे जो अक्सर बड़े भूकंपों से पहले होते हैं।

शोधकर्ता इस शोध अवधि के दौरान मंडी और आसपास के क्षेत्रों की भूवैज्ञानिक संरचनाओं, ढलान स्थिरता, चट्टान संरचना और ऐतिहासिक भूकंपीयता का विश्लेषण करेंगे। एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार इस प्रोजेक्ट के परिणामस्वरूप एक वैज्ञानिक रूप से मान्य मॉडल बनेगा जो भूकंपीय जोखिम मूल्यांकन और योजना में सुधार करने में सक्षम होगा।

उन्होंने बताया कि निष्कर्षों से राज्य और राष्ट्रीय आपदा-प्रबंधन रणनीतियों, भूकंप-रोधी भवन मानदंडों के संशोधन और बुनियादी ढांचे के ऑडिट में सीधे मदद मिलने की उम्मीद है, जो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल में सुरंगों, पनबिजली परियोजनाओं, रेल लाइनों और चार-लेन राजमार्गों का तेजी से विस्तार हो रहा है।

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