रोपड़ , दिसंबर 30 -- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रोपड़ के शोधकर्ताओं ने हानिकारक बैक्टीरिया का पता लगाने के लिए एक नयी तकनीक विकसित की है, जो अभूतपूर्व सटीकता के साथ काम करती है। यह सफलता देश भर के अस्पतालों में निदान का समय नाटकीय रूप से कम कर सकती है और रोगियों के उपचार परिणामों में सुधार ला सकती है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित इस नवाचार में 'बोरोनोपेप्टाइड्स' नामक संशोधित अणुओं का उपयोग किया गया है, जो वर्तमान तरीकों की तुलना में लगभग 40 गुना अधिक प्रभावी ढंग से रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया की पहचान कर सकते हैं। बैक्टीरियल संक्रमण लंबे समय से चिकित्सकों के लिए निदान संबंधी चुनौती रहे हैं। कई बीमारियां समान लक्षण प्रस्तुत करती हैं, और मौजूदा प्रयोगशाला परीक्षणों को जिम्मेदार सूक्ष्मजीव की सटीक पहचान करने में घंटों या कई दिन भी लग सकते हैं। इन देरी के कारण अक्सर गलत उपचार या देर से हस्तक्षेप होता है, जिससे मरीजों को अधिक खतरा होता है।

आईआईटी रोपड़ के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ अनुपम बंद्योपाध्याय ने मंगलवार को कहा, " वर्तमान निदान दृष्टिकोण की समस्या नमूना संग्रह और निश्चित परिणामों के बीच का समय अंतराल है। जब तक हमें यह पता चलता है कि कौन सा बैक्टीरिया संक्रमण पैदा कर रहा है, तब तक मूल्यवान उपचार समय खो चुका होता है।"टीम ने रोगाणुरोधी पेप्टाइड्स, जीवित जीवों में पाये जाने वाले प्राकृतिक रूप से उत्पन्न रक्षा अणुओं, में बोरॉन डालकर एक समाधान तैयार किया। जब बोरोनिक एसिड "वारहेड" से लैस किया जाता है, तो ये संशोधित पेप्टाइड्स बैक्टीरिया की सतह पर पाये जाने वाले लिपोटेइकोइक एसिड की विशेष रूप से पहचान और उससे जुड़ सकते हैं।

डॉ बंद्योपाध्याय ने कहा, " हम पहचान एजेंटों की केवल सूक्ष्म मात्रा का उपयोग करके विस्तारित अवधि के लिए उच्च गुणवत्ता वाली इमेजिंग प्राप्त कर सकते हैं, जो तकनीक को प्रभावी और किफायती दोनों बनाता है। "शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आईआईटी रोपड़ की टीम ने इन बोरोनोपेप्टाइड्स को बनाने के लिए एक सरल रासायनिक विधि विकसित की है, जिसमें न तो अत्याधुनिक उपकरणों की आवश्यकता है और न ही व्यापक विशेषज्ञता की। उन्होंने कहा कि यह सुलभता सुनिश्चित करने की कुंजी है कि प्रौद्योगिकी को व्यापक रूप से अपनाया जा सकता है, जिसमें सीमित संसाधन वाली सेटिंग्स भी शामिल हैं।

यद्यपि बोरोनिक एसिड आधारित जीवाणुरोधी सामग्री का पहले अध्ययन किया गया है, लेकिन आईआईटी रोपड़ का शोध पहला है जो व्यापक रूप से यह उजागर करता है कि ये यौगिक बैक्टीरिया में लिपोटेइकोइक एसिड को कैसे लक्षित करते हैं, जिससे निदान विकास के लिए नयी संभावनाएं खुलती हैं। शोध टीम अब इस तकनीक को रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने के लिए अनुकूलित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, एक ऐसी घटना जहां बैक्टीरिया मौजूदा एंटीबायोटिक्स का सामना करने के लिए विकसित होते हैं, जिससे उपचार अप्रभावी हो जाते हैं।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित