नयी ल्ली , दिसंबर 22 -- वन और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि आर्द्र भूमि संरक्षण के लिए 'रामसर साइट' का विकास उनकी सरकार में कई गुना बढ़ा है और अरावली पहाड़ियों को लेकर न्यायालय के फैसले से इसका क्षेत्र तय हुआ है इसलिए अब अरावली क्षेत्र में खनन का कार्य नहीं हो पाएगा।

श्री यादव ने सोमवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हरित अरावली से जुड़े मुद्दे हाल के वर्षों में तेजी से आगे बढ़े हैं और इसी का परिणाम है कि आर्द्र भूमि के संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय रामसर समझौते के तहत देश में 'रामसर साइट' की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। उनका कहना था कि 2014 में देश में जहां केवल 24 रामसर साइटें थीं वे अब श्री मोदी के हरित आंदोलन के कारण उनकी संख्या बढ़कर अब 96 हो गई है। इनमें सुल्तानपुर, भिंडावास, असोला, सिलीसेढ़ और सांभर जैसी रामसर साइटें विकसित हुई हैं। ये सभी श्री मोदी के कार्यकाल में ही रामसर साइट घोषित हुई हैं।

उन्होंने कहा कि उदयपुर को 'एक्रेडिटेड सिटी' का दर्जा हमारी सरकार के समय में ही मिला है। न्यायालय के फैसले में कहा गया है कि अरावली के संरक्षण के लिए विशेष रूप से दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में जो अरावली क्षेत्र है उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए इस पूरी रेंज के वैज्ञानिक आकलन के साथ ही दिल्ली के ग्रीन बैरियर के रूप में अरावली के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। उनका कहना था कि दिल्ली में वृक्षारोपण हो, क्षतिपूरक वनीकरण हो जिसमें गुरुग्राम की दस हजार एकड़ जमीन को संरक्षित करने का विषय हो या गुरुग्राम में साढ़े सात सौ एकड़ में ग्रीन क्रेडिट के माध्यम से क्षतिग्रस्त वनों को पुनर्जीवित करने का विषय हो, इन सब मुद्दों को उनकी सरकार ने प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया है।

श्री यादव ने कहा कि न्यायालय ने ही अरावली पहाड़ी और अरावली को लेकर एक स्पष्टता दी है क्योंकि पहले बिना सोचे परखे किसी भी जगह पर खनन की प्रक्रिया शुरु कर दी जाती थी। यह भी तय नहीं था कि नहीं होता था कि अरावली पहाड़ी और इसके अंतर्गत कौन-कौन से क्षेत्र आते हैं। अब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अरावली का क्षेत्र क्या है और वहां खनन कार्य नहीं हो सकता है।

उच्चतम न्यायालय के अनुसार अरावली पहाड़ियों में खनन को विनियमित करने को लेकर समान नीति के संबंध में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात के वन विभाग ने विचार किया है। अरावली पहाड़ियां और पर्वत श्रृंखलाएं भारत की सबसे पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से हैं और इन सभी राज्यों में फैली हुई हैं। ऐतिहासिक रूप से, इन्हें राज्य सरकारों द्वारा 37 जिलों में मान्यता दी गई है।

उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर एक समिति का गठन किया गया जिसने सिर्फ राजस्थान में ही अरावली में खनन को विनियमित करने की औपचारिक परिभाषा दी। यह परिभाषा राज्य सरकार की 2002 की समिति रिपोर्ट पर आधारित थी। इसमें स्थानीय ऊंचाई से 100 मीटर ऊपर उठने वाले सभी लैंडफ़ॉर्म को पहाड़ के रूप में पहचाना गया और उसके आधार पर, पहाड़ों और उनकी सहायक ढलानों दोनों पर खनन पर रोक लगाई गई। इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली सभी भू-आकृतियों में खनन की अनुमति है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित