भीलवाड़ा , दिसंबर 18 -- राजस्थान में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एवं कल्चरल हेरिटेज भीलवाड़ा चैप्टर संयोजक एवं पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू ने अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े निर्णय को प्रकृति के विपरीत बताया है और कहा है कि अरावली की उपेक्षा केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि प्रकृति विनाश की सबसे बड़ी त्रासदी साबित होगी।
श्री जाजू ने गुरुवार को यहां अपने बयान में यह बात कही। उन्होंने कहा कि इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को लाखों वर्षों तक भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि अरावली करोड़ों वर्षों में बनी प्राचीन भौगोलिक संरचना है, जो उत्तर भारत की ग्रीन वॉल के रूप में मरुस्थल, लू, धूल-आंधियों और प्रदूषण के खिलाफ प्राकृतिक सुरक्षा कवच रही है। इसकी पहाड़ियां, जंगल, वनस्पति, जल स्रोत, जीव-जंतु और पक्षी मिलकर एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं। इस श्रृंखला के किसी भी हिस्से को कमजोर करना पूरी प्रकृति को असंतुलित करने जैसा है।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय खनन लॉबी को सीधा लाभ पहुंचाने वाला है। जैसे ही छोटी पहाड़ियां और गैपिंग क्षेत्र संरक्षण से बाहर होंगे वहां अंधाधुंध खनन शुरू होगा। इससे भूजल रिचार्ज समाप्त होगा, जल संकट गहराएगा और पूरे क्षेत्र का भौगोलिक स्वरूप स्थाई रूप से नष्ट हो जाएगा।
श्री जाजू ने कहा कि अरावली क्षेत्र जीव-जंतुओं एवं पक्षियों का प्राकृतिक आश्रय है। जंगलों और वनस्पति के नष्ट होने से जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी और अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जायेगी। साथ ही तापमान में असामान्य वृद्धि, लू, प्रदूषण और असंतुलित मौसम आम जनजीवन के लिए गंभीर खतरा बन जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि अरावली विनाश का यह फैसला वापस नहीं लिया गया, तो इसके गंभीर और विनाशकारी परिणाम मानव समाज को कई वर्षों तक भुगतने पड़ेंगे और तब प्रकृति अपने प्रकोप के रूप में जवाब देगी। उन्होंने कहा कि इस मामले में पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित