नयी दिल्ली , दिसंबर 22 -- उच्चतम न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 814वें उर्स के दौरान अजमेर शरीफ दरगाह में चादर चढ़ाने से रोकने की मांग को लेकर पेश याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से सोमवार को इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि इस मामले में तात्कालिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

याचिकाकर्ता के वकील ने प्रस्तावित चादर चढ़ाने पर रोक लगाने का आग्रह करते हुए कहा कि अजमेर स्थित संकट मोचन मंदिर से संबंधित एक याचिका पहले से ही विचाराधीन है।

अधिवक्ता ने सुनवाई के दौरान यह निवेदन किया, "हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। संकट मोचन मंदिर से संबंधित हमारी याचिका लंबित है।"मुख्य न्यायाधीश ने तत्काल विचार के अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया, "आज सुनवाई नहीं ।"गौरतलब है कि केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू वार्षिक उर्स के तहत प्रधानमंत्री की ओर से अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने वाले हैं। प्रधानमंत्री की ओर से चादर चढ़ाने की यह रस्म कई प्रधानमंत्रियों द्वारा निभाई जाने वाली पुरानी परंपरा है।

शीर्ष न्यायालय के समक्ष पेश की गई यह याचिका अजमेर शरीफ दरगाह से संबंधित पहली कानूनी चुनौती नहीं है। इससे पहले, इसी वर्ष जनवरी में, हिंदू सेना के तत्कालीन अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अजमेर की अदालत में इसी तरह का एक आवेदन दायर किया था। यह आवेदन एक चल रहे दीवानी मुकदमे का हिस्सा था जिसमें आरोप लगाया गया था कि अजमेर शरीफ दरगाह का निर्माण ध्वस्त शिव मंदिर के स्थल पर किया गया है। अजमेर अदालत की कार्यवाही में, गुप्ता ने तर्क दिया था कि केंद्र सरकार द्वारा "विवादित संरचना" पर चादर भेजना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है। उन्होंने कहा था कि इस प्रकार के औपचारिक कृत्य न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कमजोर कर सकते हैं, जबकि स्थल को लेकर विवाद अभी लंबित है।

इससे पहले, सितंबर 2024 में, विष्णु गुप्ता ने अजमेर जिला न्यायालय में एक दीवानी मुकदमा दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राजस्थान में अजमेर दरगाह एक शिव मंदिर के ऊपर बनाई गई है।

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